राजन पारकर
बलूचिस्तान की ‘आजादी’ की घोषणा ने इस्लामाबाद की नींद उड़ाई, लेकिन असली जंग अब जमीन पर नहीं, वैधता और विश्व-स्वीकृति की है।
जिस पाकिस्तान ने दशकों तक अपने पड़ोसियों को अस्थिर करने की राजनीति की, आज उसी के घर की दीवारों से दरारों की आवाज सुनाई देने लगी है। इतिहास का यह व्यंग्य कम दिलचस्प नहीं कि जो मुल्क दूसरों के आंगन में आग लगाने की आदत पालता है, आज अपने ही आंगन से उठते धुएं से परेशान दिखाई दे रहा है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बलूच राष्ट्रवादी समूहों ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित करने, अपना झंडा, राष्ट्रगान और कथित नई मुद्रा जारी करने जैसे प्रतीकात्मक कदम उठाकर इस्लामाबाद को कड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। लेकिन केवल झंडा, राष्ट्रगान या नोट छाप देने से कोई राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त नहीं कर लेता। किसी भी नए राज्य की वास्तविक स्थिति का निर्धारण अंतर्राष्ट्रीय मान्यता, प्रभावी प्रशासन और जमीनी नियंत्रण जैसे अनेक कारकों से होता है।
सूत्रों के अनुसार पाकिस्तान की सबसे बड़ी चिंता केवल बलूचिस्तान नहीं, बल्कि यह है कि यदि असंतोष की चिंगारी दूसरे क्षेत्रों तक पहुंची तो सत्ता की बुनियाद पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं। यही कारण है कि इस्लामाबाद की बेचैनी बढ़ती दिखाई दे रही है।
उधर राजनीतिक विश्लेषकों के बीच कानाफूसी है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में भी समय-समय पर असंतोष और विरोध प्रदर्शन सामने आते रहे हैं। यदि विभिन्न क्षेत्रों में असंतोष समानांतर रूप से बढ़ता है, तो पाकिस्तान के लिए आंतरिक सुरक्षा और राजनीतिक स्थिरता बड़ी चुनौती बन सकती है।
‘दूसरों के घर में तूफान भेजने वाले हुक्मरानों को यह कभी याद नहीं रहता कि हवाओं का कोई वीजा नहीं होता। वे लौटकर अपने ही महलों की खिड़कियां भी उखाड़ ले जाती हैं।’
आज पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि किसने नया झंडा लहराया या किसने नई मुद्रा छापी। असली प्रश्न यह है कि क्या जनता का विश्वास भी उसके हाथ से फिसल रहा है?
सत्ता बंदूक के सहारे कुछ समय तक चल सकती है, लेकिन इतिहास की अदालत में अंतिम फैसला हमेशा जनता की आवाज ही सुनाती है।
