मुख्यपृष्ठस्तंभहरि बोल : युधिष्ठिर के अनुगामी

हरि बोल : युधिष्ठिर के अनुगामी

डॉ. हरि जोशी

अमेरिका के किसी मार्गदर्शक ने युधिष्ठिर को कुत्ते के साथ देख लिया होगा, जिसके साथ स्वर्ग की यात्रा युधिष्ठिर ने की थी, इसीलिए शायद अमेरिका में घर-घर कुत्ता रखने की प्रथा आ गई। कुत्ता प्रत्येक परिवार का एक हिस्सा हो गया है। वैसे तो भारत में भी कुत्तों के नाम पर जायदाद कर दी जाती है, किंतु अमेरिकी लोग पैसे के मामलों में गर्लप्रâेंड पर ही भरोसा नहीं करते, कुत्ते को क्यों देंगे? वैसा भावनात्मक प्रेम नहीं देखा जाता।
उस दिन एक अमेरिकन सज्जन मुझसे मिलने आए। कुछ देर बैठने के बाद चिंतित होकर अचानक जाने लगे, बोले- ‘बाहर मेरी डॉटर बैठी है, जरा उसकी खोज खबर ले आऊं?’
मैंने कहा- अरे आप उसे भीतर क्यों नहीं लाए? वह बाहर अकेले बैठी होगी?
बोले ‘चिंता की कोई बात नहीं, मैं उसे बांधकर आया हूं?’
-‘क्यों क्या वह सन्निपात से बीमार या पागल है, उसे बाहर बांधकर क्यों आए?’ मैंने सहज ही पूछा
-‘उसे कोई ले न जाए? वैसे किसी के साथ वह जाएगी नहीं, यदि कोई जोर जबरदस्ती करेगा तो वह शोरगुल मचाएगी।’
उत्सुकतावश मैंने प्रश्न किया
-उसकी उम्र क्या है? उत्तर मिला, ‘छोटी जाति की है, कोई १४-१५ साल होगी।
अच्छा तो अमेरिका में कुत्तों में भी छोटी जाति और बड़ी जाति होती है?
मैंने अगला प्रश्न किया-कुत्तों में भी जाति प्रथा होती है? वह बोले, ‘छोटी जाति के सदस्य अधिक जीते हैं, बड़ी नस्ल वालों की उम्र कम होती है।’
मैंने मन ही मन सोचा यहां तो १५-१६ साल की उम्र के लड़के लड़कियां, बॉयप्रâेंड या गर्लप्रâेंड बनकर साथ-साथ घूमने लगते हैं, ताकि १८ के होते-होते वे पैतृक घर से दूर हो जाएं, अपना अलग घर बनाएं। १८ साल की उम्र के बाद तो बेटे बेटी मां-बाप के लिए बोझ सरीखे माने जाते हैं। माता-पिता भी उन्हें घर छोड़ने को पहले प्रेरित और बाद में मजबूर कर देते हैं।
मैंने पूछा, ‘अरे उसे आप अकेली बाहर छोड़ आए?’
मैंने सोचा-अमेरिका में बच्चियों के मां बन जाने के याने चाइल्ड मदर के प्रकरण सर्वाधिक हैं इसीलिए यह सज्जन चिंतित होंगे।
मैंने पूछा-भीतर ले आते तो वह भी कॉफी पी लेती? कुछ खा लेती?
उत्तर मिला, ‘वह हमारा भोजन नहीं करती। उसके लिए बाजार से बीफ मिश्रित पैक्ड फूड लाना पड़ता है।’
मैं समझ गया यदि बच्चे लाड़-प्यार में पले-बढ़े हुए हों तो जो कुछ वे खाने को मांगते हैं, वह उन्हें खिलाया जाता है। लाड़ में पली होगी! मैंने मन ही मन सोचा।
कुछ रुककर उन्होंने उत्तर दिया, ‘उसके लिए फूड स्टोर से विशेष रूप से भोजन लाना पड़ता है। एक साथ, पूरे एक हफ्ते का ले आते हैं और थोड़ा-थोड़ा प्रतिदिन उसे खिलाते रहते हैं। यह प्रथा तो यहां परिवारों के सभी जिम्मेदार लोग करते हैं।’
मैंने कहा, ‘आप क्यों, मैं ही उसे बुला लाता हूं। आपने उसका नाम कुकी बताया था न?’
अब उन्होंने मासूमियत से कहा, ‘कुकी को घर ले जाकर ही खिलाएंगे। वह हमारे साथ यहां नहीं खाएगी, उसका भोजन अलग होता है।
मैंने आश्चर्यचकित होकर पूछा- ‘आप बेटी को इतनी देर से बाहर छोड़े हुए हैं, क्या अपनी बेटी को साथ लेकर सबके साथ नहीं खा सकते?’
अब उन्होंने स्पष्ट किया, ‘मेरी कुकी बेटी जरूर है, किंतु वह एक कुतिया है।’
मुझे याद आया- कल प्रात: भ्रमण के समय एक बुजुर्ग महिला भी एक कुत्ते को लेकर घूम रही थी और उसने मेरा परिचय अपने कुत्ते से भी ऐसे ही कराया था- ‘यह रहा छोटा बेटा केली, इससे बड़ा बेटा अलेक्स भी है, वह बड़ा भाई है। अलेक्स को मेरा हसबैंड जॉन घुमाने ले जाएगा। दोनों कुत्ते जब साथ-साथ घूमते हैं तो एक-दूसरे पर गुर्राते रहते हैं। वैसे अलेक्स भी हाथ मिलाता है और सचमुच एक दिन उसने आगे बढ़कर हाथ मिलाया था।’

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