हनीफ जवेरी
फिल्मी हस्तियों में सबसे ज्यादा अहंकार मैंने देखा है। कई सितारों का करियर इसी अहंकार की वजह से खत्म हो गया। ‘अभिनय सम्राट’ दिलीप कुमार और ‘संवाद-अदायगी के बादशाह’ राजकुमार के बीच भी अगर कुछ था, तो बस अहंकार। फिल्म ‘पैगाम’ उन्होंने साथ कर ली थी, लेकिन आगे चलकर दोनों का साथ काम करना उनके अपने अहंकार के कारण मुश्किल हो गया।
साठ के दशक में बनी फिल्म ‘आदमी’ के लिए दोनों फिर साथ आने को तैयार हुए। लेकिन जब राजकुमार ने निर्माता पी. एस. वीरप्पा से फिल्म की कहानी सुनी, तो अपने किरदार की लंबाई को लेकर वे संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने वीरप्पा से कहा कि उनका किरदार बड़ा किया जाए। इस पर वीरप्पा ने साफ कह दिया कि इसमें किसी भी तरह का बदलाव करने का पूरा अधिकार सिर्फ और सिर्फ दिलीप कुमार के पास है।
असल में, फिल्म पर हस्ताक्षर करते समय ही दिलीप कुमार ने यह शर्त रखी थी कि उनकी मर्जी के बिना फिल्म में किसी को शामिल नहीं किया जाएगा और न ही कोई बदलाव होगा। अब अपना किरदार बढ़वाने के लिए एक दिन सुबह-सुबह राजकुमार सीधे दिलीप कुमार के बंगले पर पहुंच गए। राजकुमार के आने की सूचना मिलने पर दिलीप ने अपने खानसामे को हिदायत दी कि राजकुमार को बंगले के बागीचे में बिठाकर उनका इंतजार करवाया जाए और उन्हें बढ़िया नाश्ता भी परोसा जाए। राजकुमार को पहले लगा कि दिलीप उनसे बहुत प्रसन्न हैं और उनका किरदार आसानी से बड़ा कर दिया जाएगा। राजकुमार ने नाश्ता किया और दिलीप कुमार का इंतजार करने लगे। लेकिन तीन घंटे बीत जाने के बाद भी उन्हें दिलीप कुमार के दर्शन नहीं हुए। आखिरकार, वे बुरी तरह ऊबकर और अपमानित महसूस करते हुए वहां से चले गए। उसके बाद उन्होंने निर्माता को सूचित कर दिया कि वे यह फिल्म नहीं करेंगे। अब राजकुमार वाले किरदार के लिए पहले फिरोज खान और फिर धर्मेंद्र का नाम सोचा गया। लेकिन उस भूमिका के लिए लगातार प्रयास कर रहे मनोज कुमार ने दिलीप साहब से अपनी निकटता के कारण अपने आदर्श के साथ फिल्म में काम करने का सपना पूरा कर लिया।
लेकिन फिल्म ‘आदमी’ से पहले एच.एस. रावैल ने फिल्म ‘संघर्ष’ में दिलीप कुमार के साथ राजकुमार को लिया था और बाकायदा उसका मुहूर्त भी हुआ था। उस समय नायिका के रूप में साधना को चुना गया था, जो रवैल की फिल्म ‘मेरे महबूब’ कर चुकी थीं। लेकिन फिल्म ‘संघर्ष’ के मुहूर्त के बाद अचानक राजकुमार ने खुद को फिल्म से अलग कर लिया। शायद उन्हें लगा कि दिलीप कुमार के साथ उनका तालमेल बिठाना मुश्किल होगा, इसलिए उन्होंने फिल्म ही छोड़ दी और उनके स्थान पर वह भूमिका बलराज साहनी को मिल गई। जहां तक साधना का सवाल है, तो कहा गया कि उन्होंने फिल्म इसलिए छोड़ दी क्योंकि दिलीप कुमार उनके साथ चुंबन दृश्य करना चाहते थे, जिसके लिए साधना राजी नहीं हुईं। नतीजा यह हुआ कि साधना को फिल्म से हटाकर उस भूमिका में वैजयंतीमाला को ले लिया गया।
राजकुमार और दिलीप कुमार दोनों ही बड़े कलाकार थे, लेकिन दोनों को हमेशा डर रहता था कि दूसरा उन पर भारी न पड़ जाए। यही कारण था कि जब सुभाष घई ने फिल्म ‘सौदागर’ के लिए उन्हें साथ लिया, तो फिल्म जगत में यह चर्चा होने लगी कि यह फिल्म पूरी नहीं हो पाएगी। लोगों ने घई को समझाया भी कि दोनों को साथ लेना जोखिम है, लेकिन घई का सपना था कि दोनों महान कलाकारों को एक ही फिल्म में दिखाया जाए। शूटिंग के दौरान सचमुच उनके अहंकार टकराने लगे। घई को कई बार दोनों के दृश्य अलग-अलग शूट करने पड़े और एक-दूसरे की तारीफ के बहाने बनाकर माहौल संभालना पड़ा। इसी बीच यह भी पता चला कि राजकुमार को वैंâसर है। बीमारी के कारण वे जल्दी अपना काम पूरा करना चाहते थे। आखिरकार, बड़ी मुश्किलों के बाद फिल्म ‘सौदागर’ पूरी हुई और दर्शकों को फिल्म ‘पैगाम’ के ३५ साल बाद फिर से दिलीप कुमार और राजकुमार को एक साथ देखने का मौका मिला।
