-ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णित है प्रचलित कथा से अलग प्रसंग; भगवान विष्णु ने हाथी का मस्तक लगाकर दिया नया जीवन
भगवान श्रीगणेश का मस्तक कटने और उन्हें हाथी का सिर लगाए जाने की कथा हिंदू धर्म की सर्वाधिक चर्चित पौराणिक कथाओं में से एक है। सामान्यतः माना जाता है कि माता पार्वती की आज्ञा का पालन करते हुए श्रीगणेश ने भगवान शिव को भवन में प्रवेश करने से रोक दिया था। क्रोधित शिव ने उनका मस्तक काट दिया। लेकिन ब्रह्मवैवर्त पुराण में इससे अलग कथा मिलती है, जिसमें इस घटना का संबंध शनिदेव की दृष्टि से बताया गया है।
पौराणिक कथा के अनुसार, पुत्र के जन्म से माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न थीं। उन्होंने बालक को आशीर्वाद दिलाने के लिए सभी देवी-देवताओं को कैलाश पर आमंत्रित किया। ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवताओं ने बालक को देखा तथा सुखी, यशस्वी और दीर्घायु होने का आशीर्वाद दिया।
सभी देवताओं के बीच शनिदेव भी उपस्थित थे, लेकिन वे सिर झुकाए खड़े रहे। उन्होंने न तो बालक की ओर देखा और न ही उसे आशीर्वाद दिया। यह देखकर माता पार्वती को आश्चर्य हुआ। उन्होंने शनिदेव से इसका कारण पूछा।
शनिदेव ने बताया कि उनकी पत्नी ने उन्हें श्राप दिया है कि वे जिस पर भी दृष्टि डालेंगे, उसका अनिष्ट हो जाएगा। इसलिए वे बालक को देखकर किसी संकट को निमंत्रण नहीं देना चाहते। माता पार्वती को अपने पुत्र और अपनी शक्ति पर पूर्ण विश्वास था। उन्होंने शनिदेव की आशंका को निराधार मानते हुए उनसे बालक को देखने का आग्रह किया।
माता के बार-बार कहने पर शनिदेव ने अत्यंत संकोच के साथ बालक की ओर देखा। उनकी दृष्टि पड़ते ही बालक का मस्तक धड़ से अलग हो गया। यह देखकर माता पार्वती शोक और क्रोध से व्याकुल हो उठीं। समस्त देवताओं में हाहाकार मच गया।
तब भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर उत्तर दिशा की ओर गए। पुष्पभद्रा नदी के तट पर उन्हें हथिनी के साथ सोता हुआ हाथी का एक बच्चा दिखाई दिया। कथा के अनुसार, भगवान विष्णु उसका मस्तक लेकर कैलाश पहुंचे और उसे पार्वती पुत्र के धड़ से जोड़ दिया। देवशक्तियों के प्रभाव से बालक पुनर्जीवित हो गया और गजमुख होने के कारण उसका नाम ‘गजानन’ पड़ा।
इसके बाद सभी देवताओं ने श्रीगणेश को आशीर्वाद दिया। उन्हें गणों का स्वामी, बुद्धि-सिद्धि का दाता, विघ्नहर्ता और प्रत्येक शुभ कार्य में सबसे पहले पूजे जाने का अधिकार प्राप्त हुआ।
इस कथा में शनिदेव को दंड देने वाला नहीं, बल्कि अपने श्राप के परिणाम से परिचित और सावधान देवता बताया गया है। इसके साथ ही यह प्रसंग माता-पिता के प्रेम, दैवी पुनर्जीवन और संकट के बाद प्राप्त होने वाले श्रेष्ठ स्थान का प्रतीक भी है।
यह वर्णन पौराणिक मान्यता पर आधारित है। अलग-अलग पुराणों और परंपराओं में श्रीगणेश के मस्तक परिवर्तन की कथाएं भिन्न रूपों में मिलती हैं।
