-रकम वापस, फिर भी एफआईआर अटकी; पालकमंत्री के निर्देश भी बेअसर? -ठेकेदार के कथित सियासी संपर्कों को लेकर उठे सवाल
सुनील ओसवाल / मुंबई
सार्वजनिक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के जव्हार कार्यालय में ७३ लाख १३ हजार ८८४ रुपए के कथित वित्तीय हेरफेर का मामला अब प्रशासनिक कार्रवाई से आगे राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। भुगतान से जुड़े दस्तावेजों और रिकॉर्ड में कथित बदलाव कर सरकारी राशि दूसरी कंपनी के नाम पर स्थानांतरित किए जाने का आरोप है। राशि बाद में सरकारी खाते में वापस जमा हो गई, लेकिन पुलिस अधीक्षक के निर्देश और पालकमंत्री की कार्रवाई की हिदायत के बावजूद एफआईआर अब तक लंबित रहने से पीडब्ल्यूडी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
सात कामों के भुगतान रिकॉर्ड में कथित फेरबदल
विक्रमगढ़ के विधायक हरिश्चंद्र भोये ने मामले की जांच के लिए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने की मांग की थी। इसके बाद पुलिस जांच में जव्हार पीडब्ल्यूडी के बी-१ रजिस्टर में दर्ज वर्ष २०१४-१५ के सात कार्यों के भुगतान से जुड़े रिकॉर्ड की पड़ताल की गई। जांच में आरोप सामने आया कि ३१ मार्च २०१९ को मूल ठेकेदारों को भुगतान किए जाने के बजाय दस्तावेजों और रिकॉर्ड में कथित फेरबदल कर ७३ लाख १३ हजार ८८४ रुपए ‘मे. जिजाऊ कंस्ट्रक्शन, विक्रमगढ़’ के नाम पर स्थानांतरित किए गए। जांच रिपोर्ट में प्रथमदृष्टया सरकारी निधि के कथित गबन की स्थिति सामने आने का उल्लेख किया गया है।
पैसा लौट गया, लेकिन जिम्मेदारी कौन लेगा?
मामला सामने आने के बाद सितंबर के पहले सप्ताह में पूरी रकम सरकारी खाते में वापस जमा कराई गई। लेकिन सवाल यह है कि यदि भुगतान प्रक्रिया में रिकॉर्ड के साथ कथित छेड़छाड़ हुई थी, तो रकम वापस आने के बाद जिम्मेदारी तय करने की कार्रवाई क्यों तेज नहीं हुई? पालघर के पुलिस अधीक्षक यतिश देशमुख ने २८ अगस्त को जव्हार के कार्यकारी अभियंता को पत्र भेजकर पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराने और कानूनी कार्रवाई के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद एफआईआर की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी। जव्हार के कार्यकारी अभियंता संजय डोंगरे के अनुसार, एफआईआर के लिए ठाणे मंडल के अधीक्षक अभियंता सिद्धार्थ तांबे से अभिमत मांगा गया है।
-अभिमत मिलने के बाद कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
-पालकमंत्री के निर्देश भी ठंडे बस्ते में?
पालघर के पालकमंत्री गणेश नाईक ने भी मामले में जांच और कार्रवाई के निर्देश दिए थे। उन्होंने स्पष्ट किया था कि सरकारी राशि वापस जमा करने से कथित गबन का मामला स्वतः समाप्त नहीं होता। संबंधितों के खिलाफ तत्काल शिकायत दर्ज करने और कार्रवाई में टालमटोल पाए जाने पर अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने के निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद कार्रवाई में देरी को लेकर सवाल उठ रहे हैं। पालकमंत्री के निर्देश के बाद भी एफआईआर क्यों अटकी रही और विभागीय स्तर पर किसका इंतजार किया जा रहा है? यह सवाल अब सार्वजनिक निर्माण विभाग से पूछा जा रहा है।
