मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाकाल से बना महाकाल हूं मैं

काल से बना महाकाल हूं मैं

काल से बना महाकाल हूं मैं,
हर रूप से विकराल हूं मैं।
रंग से बेरंग हूं मैं,
मन भोले संग हूं मैं।
नीलकंठ विष से हूं मैं,
हर अंत में समा शेष हूं मैं।
सती का प्राण धरा शव हूं मैं,
पार्वती का शिव हूं मैं।
न आदि, न अंत हूं, अनंत मैं,
नाम से जो ले, धन्य हूं मैं।
वर दे वो अपार ब्रह्म हूं मैं,
देव नहीं, मैं तेरा, ये तुझमें भ्रम हूं मैं।
नाथ में एक नाथ हूं मैं,
भोले मन का दीनानाथ हूं मैं।
नश्वर हूं मैं,
ईश्वर हूं मैं।
किंचित नहीं, पर निश्चित हूं मैं,
रहे तू हर पल निश्चिंत, जो हूं मैं।
बस तेरे पाप का प्रायश्चित हूं मैं।

-एडवोकेट हिना मिस्त्री, मुंबई

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