मुख्यपृष्ठस्तंभकाहें बिसरा गांव: देखुआरी में दर्द और ददा

काहें बिसरा गांव: देखुआरी में दर्द और ददा

बहुत पूंछा-परखी, देख-देखौआ के बाद विवाह तय हो गया था। सजीवन लंबा-चौड़ा, तगड़ा और संस्कारी लड़का था। होशियार तो था पर पढ़ने में कुछ खास नहीं था। कमजोर था पर कामचोर नहीं था। गोत्र, ननियाउर, बिस्सा बड़ा कि बिगहा जैसे कई सारे प्रश्नों के दौर से गुजरना पड़ा था उसे भी और बच्चों की तरह। घर में से बाहर आते हुए, बाहर आने, बैठने तथा बतियाने तक की परीक्षाओं से गुजरना पड़ा था। कई सारी नजरें एक साथ, एक टक बस उसे ही घूर रही थीं। कई सारे प्रश्नों के उत्तर भी नहीं दे सका था वो, पर बतियाने का अंदाज एकदम शर्माने वाला ही था। कई सारे प्रश्नों के उत्तर में तो बस अपने बाबू को निहारने लग जाता था पर लड़की पक्ष के गर्ज की बात कहें या ईश्वर की कृपा कि शादी मान ली गई थी। इसके पहले कई दफा सजीवन की भी शादी होते-होते रह गई थी पर इस बार पूरा परिवार खुश था। सजीवन पूरे गांव भर में मिठाई बांटने की मन्नत मंदिर में बहुत पहले ही मान आया था। उसे डर था कि उमर निकल जाने पर कहीं मैं ऐसे ही न रह जाऊं।
पढ़ाई-लिखाई से अलग यदि बात करी जाय तो था बड़ा ही भोला और सज्जन बालक। बस यही बात ददा को भा गई थी। ददा जबसे बैठे थे, एकटक बस सजीवन को ही निहारे जा रहे थे। इसके पहले कई बार देखुआरी के समय साइकिलों की संख्या बढ़ जाती थी और गांव के माट्साहब जरूर जाते थे। पूछा-परखी के बाद कहीं न कहीं से मामला उलट पड़ ही जाता था। इस बार भी इसके बाद वाले राउंड में साइकिलों की संख्या बढ़ती, पूछा-परखी भी और होती, जांच-पड़ताल, खेती-बाड़ी, की पूरी फेहरिस्त बनती पर ददा को बच्चे की शालीनता, बात करने का अंदाज, सूरत पसंद आ गई थी और ददा वहीं तय कर लिए थे कि अब किसी को भी नहीं ले आना है। ‘अब बस शादी होए त इंहीं लड़िका से होए।’ ददा के इस शस्त्र के आगे सभी के सारे बम-बारूदों को फींके ही पड़ने थे।
दो तीन लोगों के साथ में देखुआरी पर गया चरना आते ही दादी को दाग दिया था कि- ‘अइया लड़िकवा के त कुछु अउबइ नाइ करत फेरि पता नाइ ओकरे में ददा के काउ अइसन देखान कि ददा फिदा होइ गऽ हयेन अउर बियाहे बदे हां कइ दिहे हयेन।
‘का?’.. दादी का मुंह खुला का खुला रह गया, कनमना उठी थी दादी और बोल पड़ी चरना से।
‘अउर बताउ? का.. का.. दिक्कत बाऽ ओकरे में?’
‘अइया पढ़इ में त ऊ बहुतइ कमजोर बाऽ, हां बाकी लाज-शरम, मान मर्यादा, बतकही में, देखै-ताकै में सब कुछ ठीक बाऽ रे। चेहरा-मोहरा त जइसन केउ गढ़ि के उतारि दिहे होइ रे।’
दादी का गुस्सा, जो पहले सातवें आसमान तक पहुंच गया था, तमतमाया तवा हो गया था जो, अब कुछ शांत सा हो गया था। वहीं दरवाजे के पीछे छिप कर खड़ी रुपाली भी सुन रही थी सब कुछ। पढ़ाई-लिखाई में कमजोर सुन कर मन तो उसका भी खराब हुआ था पर सुंदरता की बात सुनकर वह भी मगन हो उठी थी, अभी और कुछ सुन पाती कि एक कन्धे पर गुस्सा दूसरे पर खुशी लिए दादी दुआरे खटिया पर बड़े आराम से बैठे ददा के पास पहुंच गई और बोल पड़ी- ‘का हो इ कइसन लड़िका देखिके आय हऽ..? अउर अगर अइसनइ बियाह करइ के रहा त का करइ तीन साल जोहे रहऽ..? पहिलेन निपटाइ दिहे होतऽ।’ दादी गुस्से में बोल रही थीं कि मजाक में? अंतर कर पाना मुश्किल था।
‘अंह..अंह.. रचि के धीरे से बोलऽ.. का करइ होंकड़थऊ। अगले-बगले चाट्ठे मनई रहथैं अउर फेरि कान त देवारौ के होथऽ’- ददा को बोलना ही पड़ा। दादी चकर-पकर इधर-उधर देखते हुए बोली हां..हां.. कहत त सहियइ हयऽ हो बुढ़ऊ’। दादी शांत हो गई।
‘का भऽ हो बूढ़ा..? चरना दागि दिहेस काऽ..? चरना से नाइ पूंछु कि कइ तक अपुना पढ़े बाऽ..? का ओकर बियाह नाइ भ बाऽ? कइ तक तूं पढ़े रहू? का तोहार बियाह नाइ भवाऽ? का तूं नाइ सम्हारि पाउ का आपन घर-दुआर..’ ददा के सभी प्रश्नों का कोई जवाब ही नहीं था दादी के पास।
‘हूं.. कहत त सहियइ हयऽ.. अच्छऽ त कुछु बतउबऽ..? काउ-काउ देखऽ कि जवन मोहाइ गयऽ लड़िकवाऽ पे?
*
क्रमशः
*
पंकज तिवारी
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)

अन्य समाचार