मुख्यपृष्ठस्तंभनारे में नहीं सच में हो आत्मनिर्भरता

नारे में नहीं सच में हो आत्मनिर्भरता

लोकतंत्र में सरकार की जिम्मेदारी केवल विकास परियोजनाएं शुरू करना नहीं, बल्कि समाज के कमजोर और जरूरतमंद वर्गों को आवश्यक सहायता उपलब्ध कराना भी है। भोजन, ईंधन, कपड़े जैसी बुनियादी जरूरतों से जुड़ी योजनाएं इसी सामाजिक दायित्व का हिस्सा हैं। लेकिन इन योजनाओं की सफलता केवल घोषणा से नहीं, बल्कि उनके नियमित संचालन, वित्तीय स्थिरता, पारदर्शिता और वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंच से तय होती है। महाराष्ट्र में हाल के घटनाक्रम ने इस सवाल को फिर सामने ला दिया है। राज्य की वस्त्रोद्योग नीति 2023-28 के तहत 2 जून 2023 को अंत्योदय राशन कार्ड धारक परिवारों को हर साल एक साड़ी मुफ्त देने वाली कैप्टिव मार्केट योजना शुरू की गई थी। करीब 24 लाख 58 हजार 747 अंत्योदय परिवार इस योजना के दायरे में थे। अब सरकार ने वित्तीय दायित्वों का आकलन करने के बाद वित्तीय वर्ष 2026-27 से इस योजना को बंद करने का निर्णय लिया है।
इसके बाद मुख्यमंत्री अन्नपूर्णा योजना को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। वर्ष 2024 में शुरू इस योजना के तहत पात्र परिवारों को साल में तीन एलपीजी सिलेंडरों की सब्सिडी देने का प्रावधान किया गया था। राज्य में बड़ी संख्या में बीपीएल और अंत्योदय परिवार इसके संभावित लाभार्थी हैं। यदि किसी योजना का लाभ नियमित रूप से नहीं मिल रहा है तो सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि देरी का कारण क्या है, कितनी राशि लंबित है और आगे की व्यवस्था क्या होगी। सबसे महत्वपूर्ण सवाल शिव भोजन थाली योजना को लेकर है। वर्ष 2020 में शुरू हुई इस योजना का उद्देश्य जरूरतमंद लोगों को 10 रुपये में भोजन उपलब्ध कराना था। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार राज्य में करीब 1,900 केंद्रों के माध्यम से रोजाना 1.7 लाख से अधिक थालियां परोसी जाती हैं। लेकिन कई जिलों में केंद्र संचालकों को महीनों से अनुदान और भुगतान नहीं मिलने की शिकायतें हैं। महंगाई, गैस और खाद्य सामग्री की बढ़ती कीमतों के बीच भुगतान में देरी से कई केंद्रों के संचालन पर संकट पैदा होना स्वाभाविक है। यहां एक संतुलित दृष्टिकोण जरूरी है। हर कल्याणकारी योजना को केवल ‘मुफ्तखोरी’ कहना उचित नहीं होगा। किसी भूखे व्यक्ति को रियायती दर पर भोजन उपलब्ध कराना सीधे तौर पर जनहित का कार्य है। लेकिन सरकार का अंतिम लक्ष्य लोगों को हमेशा सहायता का लाभार्थी बनाए रखना भी नहीं हो सकता। शिक्षा, कौशल, रोजगार, स्वरोजगार और छोटे व्यवसाय के अवसर बढ़ाकर लोगों को आत्मनिर्भर बनाना अधिक स्थायी समाधान है। इसलिए नीति ऐसी होनी चाहिए जिसमें आज जरूरतमंद को राहत मिले, कल उसे अवसर मिले और भविष्य में वह आत्मनिर्भर बने। सरकार किसी योजना को बंद करती है तो उसके कारण, वित्तीय बोझ और वैकल्पिक व्यवस्था के आंकड़े सार्वजनिक किए जाने चाहिए। सवाल केवल मुफ्त साड़ी, गैस सिलेंडर या 10 रुपये की थाली का नहीं है। सरकारी धन का इस्तेमाल इस तरह किया जाए कि जरूरतमंद को सम्मान के साथ राहत भी मिले और लंबे समय में उसे सहायता की जरूरत ही न पड़े।

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