अनिल मिश्र / पटना
वैसे तो अपने देशभर में प्रतिदिन भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के जलाभिषेक एवं पूजा-अर्चना किया जाता है, लेकिन सावन माह की महिमा ही निराली है। पूरे वर्षभर में खास माह सावन का नाम आते ही लोगों में भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंग पर कांवर यात्रा निकाल कर भगवान शिव को गंगा जल सहित कई नदियों का जल अर्पित करने की परंपरा है। इस सावन माह के अवसर पर सभी ज्योतिर्लिंग सहित प्रत्येक शिवालयों में भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए लंबी-लंबी कतारें देखी जाती हैं। वहीं सावन मास के सोमवार को तो इन सभी मंदिरों में अलग ही बात होती है, जबकि अंतिम सोमवार को तो मानों इन सभी शिव मंदिरों का कहना है कि मेरी बारी भगवान भोलेनाथ को जलाभिषेक करने की कब आएगी। इसी कड़ी में बिहार प्रदेश के गया जिला अंतर्गत खिजरसराय प्रखंड में सावन के अवसर पर शनिवार को कुड़वा पंचायत के श्यामनगर गांव से 551 फीट लंबी कांवड़ यात्रा निकाली गई। इस विशाल कांवड़ को कंधे पर लेकर बड़ी संख्या में श्रद्धालु यात्रा में शामिल हुए। वहीं हर-हर महादेव और बोल-बम के जयकारों से गुंजायमान खिजरसराय प्रखंड के श्यामनगर सहित आस-पास का पूरा इलाका भक्तिमय हो गया। जैसा कि यहां के ग्रामीणों के सहयोग से लगातार चौथे वर्ष आयोजित इस कांवर यात्रा में युवाओं के साथ महिलाएं और बुजुर्ग भी उत्साहपूर्वक शामिल हुए। वहीं डीजे की धुन और भोलेनाथ के जयघोष के बीच श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनते रहें, जबकि 551 फिट यह लंबी कांवड़ यात्रा आकर्षण का प्रमुख केंद्र रही। इसे देखने के लिए आस-पास के ग्रामीण अपने गांवों से बड़ी संख्या में यहां पहुंचे। इस यात्रा के प्रमुख व्यक्ति शैलेंद्र कुमार ने बताया कि श्रद्धालु बस से चलकर राजधानी पटना जिले के फतुहा स्थित गंगा तट पहुंचेंगे। उसके वहां से अपने-पवित्र कलश पात्र में गंगाजल भरने के बाद पैदल यात्रा शुरू होगी, जो दनियावां, हुलासगंज, नई बाजार और कुड़वा होते हुए बराबर (वाणावर) पहाड़ पहुंचेगी। इस बराबर (वाणावर) पहाड़ स्थित बाबा सिद्धेश्वर नाथ (भगवान भोलेनाथ) का गंगाजल से जलाभिषेक करेंगे। इस संबंध में उन्होंने बताया कि यात्रा को लेकर श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा के लिए पेयजल, भोजन और ठहरने सहित आवश्यक व्यवस्थाएं की गई हैं। वहीं आयोजकों ने कहा कि इस धार्मिक आयोजन का उद्देश्य भगवान भोलेनाथ के प्रति आस्था प्रकट करने के साथ ग्रामीणों के बीच आपसी भाईचारे, सामाजिक एकता एवं सामाजिक समरसता को मजबूत करना भी है।
