रामगोपाल वर्मा की फिल्म ‘सत्या’ से बतौर को-राइटर अपना करियर शुरू करनेवाले अनुराग कश्यप आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। गोरखपुर में जन्मे अनुराग की फिल्मों का बैकड्रॉप अमूमन उत्तर प्रदेश या बिहार दिखाया जाता है। अपनी बातों को बड़ी ही बेबाकी से कहनेवाले अनुराग इन दिनों अपनी फिल्म ‘निशानची’ को लेकर सुर्खियों में हैं। पेश हैं, अनुराग कश्यप से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-
फिल्म ‘निशानची’ को उत्तर प्रदेश में शूट करने की क्या वजह रही?
मेरा जन्म और परवरिश सब कुछ उत्तर प्रदेश में ही हुआ। मेरे पिता यूपी सरकार में चीफ इंजीनियर थे। मैं यूपी के काफी हिस्सों में रहा हूं इसलिए वहां के लोगों के रहन-सहन आदि से वाकिफ हूं। इसलिए ये जाहिर सी बात है कि मेरी फिल्मों में यूपी और बिहार का रेफरेंस होगा।
क्या आपने फिल्म में कलाकारों को कानपुरिया दिखने के लिए काफी ट्रेनिंग दी?
हां, फिल्म की कहानी कानपुरिया है। जब भी हम गुंडे की बात करते हैं तो हमारी धारणा होती है कि गुंडे और बदमाश काफी हट्टे-कट्टे और लंबे-चौड़े होते हैं। मैंने अपनी फिल्म ‘निशानची’ शुरू की तो मैंने कलाकारों से साफ-साफ कहा कि मुझे फिल्म के लिए सिक्स पैक वाला या जिम बॉडी वाला लड़का नहीं चाहिए। मुझे नॉर्मल लुक वाला लड़का चाहिए।
आपके डिप्रेशन के बारे में भी काफी कुछ सुना है?
हमारे फील्ड में डिप्रेशन आना लाजिमी है क्योंकि जो करना चाहते हैं वो होता नहीं। खैर, आशा-निराशा का खेल जीवन भर चलता है, लेकिन कभी-कभी ऐसा भी दौर आता है जब निराशा हावी हो जाती है। मेरी बेटी अलाया ने मुझे डिप्रेशन से बाहर निकाला। बॉलीवुड की वैंâपबाजी और ग्रुपिज्म मुझे कभी रास नहीं आया। देसी पैटर्न की फिल्मों ने मुझे संतुष्टि दी।
आपके बंगलुरु शिफ्ट होने की वजह क्या रही?
दुनिया तेजी से बदल चुकी है, लेकिन मैं इस बदली हुई दुनिया को समझ नहीं पाया। फिल्म और फिल्मवालों की जिस दुनिया को मैं समझता रहा, वो ये है ही नहीं। बॉलीवुड में अब आपस में कोई संवाद नहीं रहा। सारे पुराने फिल्म प्रोडक्शन ऑफिसेस अब बंद हो चुकी हैं और पूरा माहौल टॉक्सिक हो चुका है। मैं अभिनय कर सकता हूं इसलिए साउथ से मुझे एक्टिंग के ऑफर्स आने लगे।
