भीड़ भरे इस दौर में, मन कितना वीरान,
चेहरों के मेले लगे, खोया है इंसान।।
ऊपर मीठी बोलियां, भीतर जहरी दांत,
मौका मिलते ही करें, रिश्तों पर आघात।
हंसते चेहरे ओढ़कर, घूम रहा शैतान—
चेहरों के मेले लगे, खोया है इंसान।।
मंचों पर आदर्श हैं, भीतर काला खेल,
सच की बस्ती जल रही, झूठ बजाए ढोल।
नोटों के आगे हुआ, हर उसूल नीलाम—
चेहरों के मेले लगे, खोया है इंसान।।
मां-बापों को छोड़कर, बच्चे हुए महान,
चार दिनों की नौकरी, भूला अपने कान।
धन की अंधी दौड़ में, टूट गया सम्मान—
चेहरों के मेले लगे, खोया है इंसान।।
भूखे बच्चे सो गए, नेता गिनते वोट,
जनता के हिस्से मिली, आश्वासन की चोट।
सत्ता की चौखट हुआ, संवेदन श्मशान—
चेहरों के मेले लगे, खोया है इंसान।।
रिश्तों तक में बिक रहा, मतलब का व्यापार,
सच्चे दिल को मिल रहा, हर मोड़ तिरस्कार।
आत्मा रोती देखती, मरता रोज ईमान—
चेहरों के मेले लगे, खोया है इंसान।।
-डॉ. प्रियंका सौरभ
