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भारत-नेपाल संबंध और प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की मुखर कूटनीति

– डॉ. रवि रमेशचंद्र

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र “बालेन” शाह के नेतृत्व में भारत-नेपाल संबंध एक नए और संवेदनशील दौर में प्रवेश कर चुके हैं। हालांकि दोनों पड़ोसी देश भूगोल, इतिहास, संस्कृति और आर्थिक अंतर्निर्भरता से आपस में जुड़े हुए हैं, लेकिन हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों ने इस द्विपक्षीय रिश्ते में नई जटिलताएं पैदा कर दी हैं। बालेन शाह की राष्ट्रवादी बयानबाजी, भारत के विदेश सचिव से मिलने से उनके कथित इनकार और लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवादों पर उनकी टिप्पणियों ने दोनों देशों में एक नई बहस को जन्म दिया है। इसके साथ ही, नेपाल के सत्ताधारी दल के नेतृत्व की भारत यात्रा और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेताओं के साथ उनकी बैठकों ने यह संकेत भी दिया है कि राजनीतिक जुड़ाव के रास्ते अभी भी सक्रिय और महत्वपूर्ण बने हुए हैं। ये विरोधाभासी घटनाक्रम समकालीन भारत-नेपाल संबंधों की दोहरी प्रकृति को उजागर करते हैं : एक तरफ सार्वजनिक रूप से राजनीतिक मुखरता और दूसरी तरफ व्यावहारिक कूटनीतिक जुड़ाव।
नए दौर का नेतृत्व और कूटनीतिक मर्यादाएं
नेपाल में व्यवस्था-विरोधी (एंटी-एस्टेब्लिशमेंट) आंदोलन और युवाओं के नेतृत्व वाले राजनीतिक परिवर्तन के माध्यम से राष्ट्रीय पटल पर उभरने वाले प्रधानमंत्री बालेन शाह नेपाली नेतृत्व की एक नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनका राजनीतिक आकर्षण पारदर्शिता, राष्ट्रीय आत्मसम्मान के वादों और पारंपरिक राजनीतिक तौर-तरीकों से दूरी बनाने पर टिका है। पद संभालने के बाद से शाह ने खुद को एक ऐसे नेता के रूप में पेश करने का प्रयास किया है, जो स्थापित कूटनीतिक मानदंडों का पालन करने के लिए तब तक तैयार नहीं है, जब तक कि उन्हें यह न लगे कि इससे नेपाल की संप्रभुता से समझौता हो रहा है।
हाल के महीनों में सबसे चर्चित प्रकरणों में से एक वह रिपोर्ट थी, जिसमें कहा गया था कि शाह ने भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री की काठमांडू यात्रा के दौरान उनसे मिलने से इनकार कर दिया था। खबरों के मुताबिक, नेपाली प्रधानमंत्री ने उस स्तर पर बैठक को प्राथमिकता दी, जिसे वे राजनीतिक रूप से अपने समकक्ष मानते थे। इस कदम ने राजनयिकों और विदेश नीति विश्लेषकों के बीच व्यापक बहस छेड़ दी। शाह के समर्थकों ने इस फैसले को द्विपक्षीय संबंधों में संप्रभु समानता के दावे के रूप में देखा, जबकि आलोचकों का तर्क था कि कूटनीतिक प्रथाओं से इस तरह का विचलन नेपाल के सबसे बड़े पड़ोसी के साथ अनावश्यक तनाव पैदा करने का जोखिम उठाता है।
यह घटना इसलिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी क्योंकि भारत और नेपाल पारंपरिक रूप से राजनयिक और राजनीतिक माध्यमों से लगातार उच्च स्तरीय संपर्क बनाए रखते हैं। दशकों से वरिष्ठ अधिकारियों के बीच बैठकें व्यापार और बुनियादी ढांचे से लेकर सीमा प्रबंधन और ऊर्जा सहयोग तक की चिंताओं को दूर करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम रही हैं। इसलिए, कई पर्यवेक्षकों ने शाह के इस रुख को एक संकेत के रूप में देखा कि काठमांडू का नया नेतृत्व नई दिल्ली के साथ जुड़ाव के तौर-तरीकों को फिर से परिभाषित करना चाहता है।
सीमा विवाद और तीसरे पक्ष का दृष्टिकोण
यह कूटनीतिक बहस तब और तेज हो गई, जब शाह ने भारत-नेपाल सीमा विवाद को लेकर टिप्पणियां कीं। पिछले रुख से पूरी तरह अलग हटते हुए, उन्होंने तर्क दिया कि क्षेत्रीय असहमतियों को केवल भारतीय अतिक्रमण के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि दोनों ही देश उन क्षेत्रों पर काबिज हैं, जिन पर दूसरा देश अपना दावा करता है। इसके साथ ही, उन्होंने यह भी संकेत दिया कि सीमा मुद्दे के ऐतिहासिक उद्गम से जुड़ी चर्चाओं में यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन) और चीन जैसे देश भी भूमिका निभा सकते हैं।
भारत ने इन सुझावों पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। नई दिल्ली ने अपने पुराने रुख को दोहराया कि नेपाल के साथ सभी लंबित सीमा मुद्दों को द्विपक्षीय रूप से हल किया जाना चाहिए और इसमें किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की कोई भूमिका नहीं है। विदेश मंत्रालय ने इस बात पर जोर दिया कि दोनों देशों के बीच के संबंधों में संवाद और आपसी समझ के माध्यम से मतभेदों को दूर करने के लिए पर्याप्त संस्थागत तंत्र मौजूद हैं।
नेपाल के भीतर शाह की टिप्पणियों ने काफी राजनीतिक हलचल पैदा की। जहां कुछ राष्ट्रवादी समूहों ने स्थापित कूटनीतिक धारणाओं को चुनौती देने की उनकी इच्छा की सराहना की, वहीं दूसरों को डर था कि ये टिप्पणियां ऐसे समय में नेपाल के विदेशी संबंधों को जटिल बना सकती हैं, जब आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्राथमिकताएं बनी हुई हैं। रिपोर्टों से संकेत मिला कि नेपाल के राजनीतिक हलके के एक बड़े हिस्से ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि कुछ विवादास्पद बयान आधिकारिक विदेश नीति में किसी मौलिक बदलाव के बजाय उनके व्यक्तिगत विचार थे।
व्यावहारिक कूटनीति का दूसरा पहलू
फिर भी, बालेन शाह के नेतृत्व में भारत-नेपाल संबंधों की कहानी केवल टकराव की नहीं है। इन विवादों के समानांतर, दोनों देशों के बीच रचनात्मक राजनीतिक जुड़ाव बनाए रखने के स्पष्ट प्रयास भी दिखाई दिए हैं। एक विशेष रूप से महत्वपूर्ण घटनाक्रम नेपाल के सत्ताधारी राजनीतिक दल के वरिष्ठ नेताओं की भारत यात्रा थी, जहां भाजपा नेताओं के साथ बैठकें आयोजित की गईं।
इस तरह के संपर्क काफी महत्व रखते हैं क्योंकि दक्षिण एशिया में पार्टी-टू-पार्टी (दल-स्तरीय) कूटनीति अक्सर औपचारिक सरकारी संबंधों की पूरक बनती है। भाजपा, भारत के सत्तारूढ़ दल के रूप में, क्षेत्रीय राजनीतिक जुड़ाव को आकार देने में एक प्रभावशाली कारक बनी हुई है। नेपाली और भारतीय राजनीतिक दलों के बीच यह संपर्क आधिकारिक राजनयिक संरचनाओं से परे संचार का एक अतिरिक्त जरिया प्रदान करता है।
इस यात्रा ने उस व्यावहारिक वास्तविकता को रेखांकित किया, जिसे अक्सर राजनीतिक विवादों के बीच नजरअंदाज कर दिया जाता है : समय-समय पर होने वाले मतभेदों के बावजूद, न तो भारत और न ही नेपाल लंबे समय तक एक-दूसरे से दूरी बनाए रखने का जोखिम उठा सकते हैं।
* व्यापार और पारगमन: भारत आज भी नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार, निवेश और रोजगार के अवसरों का एक प्रमुख स्रोत तथा नेपाल के अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्य के लिए एक महत्वपूर्ण पारगमन मार्ग है।
* रणनीतिक महत्व: इसी तरह, नेपाल भारत की रणनीतिक और सांस्कृतिक पड़ोस नीति (नेबरहुड पॉलिसी) में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
* सांस्कृतिक जुड़ाव: खुली सीमाएं, व्यापक जन-सांस्कृतिक संपर्क और साझा धार्मिक परंपराएं यह सुनिश्चित करती हैं कि द्विपक्षीय संबंध सरकारी बातचीत के दायरे से कहीं आगे तक फैले हुए हैं।
*भविष्य की राह: राष्ट्रवाद बनाम व्यावहारिकता
शाह का सुधारवादी एजेंडा और मजबूत जनमत नेपाल में अधिक राजनीतिक स्थिरता ला सकते हैं। द्विपक्षीय सहयोग को परिणामोन्मुख और उत्पादक बनाने की दिशा में नए रास्ते खुल सकते हैं। संप्रभुता और क्षेत्रीय प्रभाव से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर उनका राष्ट्रवाद तनाव पैदा कर सकता है। पारंपरिक शक्ति संरचनाओं को चुनौती देने की घरेलू छवि और कूटनीतिक समझौतों के बीच संतुलन बनाना कठिन होगा।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि भाजपा नेतृत्व द्विपक्षीय संबंधों में निरंतरता बनाए रखते हुए नेपाल की इस नई राजनीतिक पीढ़ी के साथ जुड़ने का इच्छुक दिखाई दे रहा है।
शाह के लिए घरेलू अपेक्षाओं और राजनयिक वास्तविकताओं के बीच संतुलन बनाना उनके नेतृत्व की सबसे कठिन परीक्षा होगी। उनकी अधिकांश राजनीतिक सफलताएं पारंपरिक सत्ता संरचनाओं को चुनौती देने वाली उनकी छवि पर बनी हैं। हालांकि, शासन चलाने के लिए अक्सर समझौतों की आवश्यकता होती है, विशेष रूप से विदेश नीति में, जहां आर्थिक और रणनीतिक हितों को बेहद सावधानी से प्रबंधित करना होता है।
शाह के हालिया बयानों से संकेत मिलता है कि वे भारत के साथ रचनात्मक संबंध बनाए रखने के महत्व से वाकिफ हैं। मतभेदों के बीच भी उन्होंने द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत करने और संबंधों को अधिक उत्पादक बनाने का समर्थन किया है। ऐसे बयान बताते हैं कि उनकी सरकार नई दिल्ली के साथ संबंधों को तोड़ने के बजाय, उन्हें एक नए सांचे में ढालने (रिकैलिब्रेशन) का प्रयास कर रही है।
निष्कर्ष
आने वाले महीने संभवतः यह तय करेंगे कि मौजूदा तनाव एक अधिक गंभीर कूटनीतिक चुनौती में बदल जाता है या एक नए राजनीतिक युग के लिए भारत-नेपाल संबंधों को फिर से परिभाषित करने की एक व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा बनता है। सीमा विवाद, कनेक्टिविटी परियोजनाएं, जलविद्युत सहयोग और व्यापार सुगमता जैसे मुद्दे दोनों सरकारों की मतभेदों को प्रबंधित करने और साझा हितों को आगे बढ़ाने की क्षमता की परीक्षा लेते रहेंगे।
फिलहाल, यह रिश्ता एक दिलचस्प चौराहे पर खड़ा है। बालेन शाह की मुखर राजनीतिक शैली ने नेपाल के घरेलू राजनीतिक प्रवाह को दर्शाते हुए भारत के साथ जुड़ाव में एक नया आयाम जोड़ दिया है। वहीं दूसरी ओर, राजनीतिक दलों और राजनयिक संस्थानों के बीच निरंतर आदान-प्रदान यह साबित करता है कि दोनों देश सहयोग के स्थायी मूल्य को पहचानते हैं।
चूंकि दक्षिण एशिया इस समय महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक बदलावों का गवाह बन रहा है, भारत और नेपाल एक ऐसे रिश्ते को संभालने के लिए तैयार दिखते हैं, जो एक ही समय में मुखरता और सामंजस्य, राष्ट्रवाद और व्यावहारिकता से चिह्नित है। काठमांडू और नई दिल्ली के नेताओं के लिए चुनौती यह सुनिश्चित करने की होगी कि अस्थायी राजनीतिक मतभेद उस साझेदारी की गहरी नींव पर हावी न हों, जो पीढ़ियों से चली आ रही है।
डॉ. रवि रमेशचंद्र, सह-आचार्य, अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), दिल्ली।

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