पहल!

होम करते हाथ जलाने पड़ते हैं
एक नेक काम करने के लिए
पहल अपने घर से करनी पड़ती है,
चली आ रही कुरीतियों की
निंदा करना आसान है
तर्क-वितर्क भी किया जाता है अक्सर
चलन के रीति-रिवाजों के बंधन
तोड़ना, नहीं इतना भी आसान।
पहला कदम उठा घर से
औचित्य सिद्ध करना पड़ता है
बिना आडंबर के जन्म, मृत्यु, विवाह के
काम निभाने होंगे।
क्रांति का बिगुल बजाना अच्छा लगता है
बहरे कानों के पर्दों को
खोलना कभी-कभी मुश्किल होता है
योद्धा वही कहलाता है जो
वास्तव में कठिनाइयां झेलता है
कर्मश्रेत्र से पीठ दिखा कर न लौटता
निष्फल प्रयासों से होता न हताश
कांटों भरे मार्ग पर चलता रहता।
युग द्वापर नहीं, अब कलयुग है
आज अभिमन्यु भी नहीं आएगा
चक्रव्यूह भेदने, जान की बाजी लगाने
समाज विरोधी सभी जाल
हमें मिल कर सुलझाने होंगे
समाज सुधार का बीड़ा सबके
कंधों पर होगा।
प्रत्येक कदम के साथ
कारवां बनता जाएगा, परंतु
पहल करने का पहला कदम
अपने परिवार से उठाना होगा।
-बेला विरदी

अन्य समाचार