मुख्यपृष्ठस्तंभशिलालेख :  वंदे मातरम् ... भारत की सांस्कृतिक चेतना का राष्ट्रमंत्र

शिलालेख :  वंदे मातरम् … भारत की सांस्कृतिक चेतना का राष्ट्रमंत्र

हृदयनारायण दीक्षित
लखनऊ

संसद में हाल ही में वंदे मातरम् पर अधिनियम बनाया गया है। अब वंदे मातरम् का विरोध करने वालों पर सजा का प्रावधान किया गया है। भारत के दो नाम हैं, इंडिया और भारत। जन गण मन राष्ट्रगान है, रवींद्रनाथ टैगोर ने ‘जन गण मन’ १९११ में लिखा था। वंदे मातरम् राष्ट्रगीत है। इसमें भारत की धरती की प्रार्थना है। ऋग्वेद के १०वें मंडल (सूक्त १८.१०) में धरती माता ‘मातरं भूमि’ है। यह कोमल स्पर्शवाली सभी ऐश्वर्यों की स्वामिनी हैं। विद्वान १०वें मंडल की तुलना में ५वें मंडल को प्राचीन बताते हैं। मंडल ५ सूक्त ८४ के ऋषि अत्रि ‘पृथ्वी को गुणवती, महिमावती सभी प्राणियों को पुष्ट करने वाली, जल बरसाने वाली आदि बताकर स्तुति करते हैं। अथर्ववेद का पृथ्वी सूक्त अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित है। ६३ प्रीतिकर श्लोकों में गठित इस सूक्त में ‘माता भूमि पुत्रोऽहम पृथिव्याश् है’ (मंत्र १२) धरती को मां मानने वाली ऋग्वैदिक प्रतीति का विस्तार पृथ्वीसूक्त है। महाभारत (अनुशासन पर्व) में कृष्ण ने श्रेष्ठ कर्म के बारे में पृथ्वी से पूछा ‘हे वसुंधरे मुझको या मेरे जैसे मनुष्य को किस कर्म का अनुष्ठान करना चाहिए।’ पृथ्वी ने बताया ‘गृहस्थ को अपने अन्न का एक भाग देवों, पितरों, अतिथियों को देना चाहिए।’
भारत की इसी सांस्कृतिक परंपरा से बंकिमचंद्र का `वंदे मातरम्’ आया। स्वतंत्रता संग्राम में यह घर-घर का गीत था। राष्ट्रगीत था। गांधी जी इस गीत के प्रशंसक थे। उन्होंने १९०५ में लिखा, ‘इस गीत को हमारा राष्ट्रगीत बनना चाहिए।’ फिर १९३६ में लिखा ‘कवि भारत माता को सुहासिनी, सुमधुर भाषिणी, बहुबल धारिणी, सुफला कहते हैं। मेरी राय में वह समस्त मानव जाति को अपने में समा लेती है।’
कांग्रेस १८८५ में बनी। एक वर्ष बाद कलकत्ता में हुए अधिवेशन (१८८६) में हेमेंद्र बाबू ने राष्ट्रगीत गाया। अध्यक्ष मो. रहमत उल्लाह सायानी ने कोई प्रतिवाद नहीं किया। १६ अक्टूबर १९०५ के दिन बंगभंग लागू होना था। दुर्गापूजा के उत्सव जारी थे। रवींद्रनाथ टैगोर ने इसी दिन ‘राखी बंधन दिवस’ मनाने की घोषणा की। बंगाल धधक उठा। पूरा राष्ट्र खड़ा हो गया। भारत के अवनि-अंबर में वंदे मातरम् था। ८ नवंबर को वंदे मातरम् प्रतिबंधित हो गया। विश्वविख्यात चिंतक विल डूरेंट ने बाद में कहा, ‘इट वाज १९०५, देन दैट इंडियन रिवोल्यूशन बिगैन।’ वाराणसी के कांग्रेस अधिवेशन (१९०५) में फिर से वंदे मातरम् गूंजा। पूर्वी बंगाल में कांग्रेस ने शोभायात्रा (१९०६) निकाली। सेना ने लाठीचार्ज किया। कांग्रेसी नेता अब्दुल रसूल सहित पूरी शोभायात्रा ने वंदे मातरम् का जयकारा लगाया।
`वंदे मातरम्’ अपने अवतरण काल से ही राष्ट्र आराधना का बीजमंत्र था। बंगाल विभाजन के विरोध में आंदोलित बंगभूमि और समूची भारतभूमि ने इसी मंत्र का पुरश्चरण किया। भारत के अनेक भाषाभाषी कवियों ने इसका अनुवाद किया। जैसे वाल्मीकि की संस्कृत रामकथा को कंब ने तमिल में घर-घर पहुंचाया वैसे ही विश्वविख्यात तमिल कवि सुब्रह्मण्यम भारती ने सीनियर पेरूकिनै, इनकनी वलरित्ति ने वंदे मातरम् गाया, फिर ल़ न. पंतलु ने तेलगु में भावाभिव्यक्ति दी। भाषाएं अनेक, ‘भारत माता और वंदे मातरम् एक’ का आसेतु हिमाचल प्रवाह था।
फिर आया १५ अगस्त १९४७ का सुप्रभात। श्रीमती सुचेता कृपलानी ने वंदे मातरम् गाया। आकाशवाणी के निदेशक ने इसके कुछ दिन पूर्व प्रख्यात संगीताचार्य पं. ओंकारनाथ ठाकुर को वंदे मातरम् गायन के लिए न्योता देते हुए कहा ‘सरदार पटेल ने इसी कार्य के लिए आपको बुलाया है।’ ठाकुर ने कहा ‘हम आएंगे तो ‘पूरा’ गाएंगे, सरदार को मेरे मनोभाव बताइए।’ आकाशवाणी से वंदे मातरम् का पूरा प्रसारण हुआ। संविधान सभा में प्रधानमंत्री पं़ जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा (२५ अगस्त १९४८) में स्पष्टीकरण दिया ‘न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र जनरल असेंबली (१९४७) में हमारे प्रतिनिधि से राष्ट्रगान की मांग की गई। हमारे पास उस समय राष्ट्रगान की कोई रिकॉर्डिंग नहीं थी, जिसे हम विदेश भेज सकते। प्रतिनिधि के पास ‘जन गण मन’ का रिकॉर्ड था। इसे आर्वेâस्ट्रा को दिया गया। इसे बजाया गया तो अनेक देशों के प्रतिनिधियों को बहुत पसंद आया। उन्होंने इसे बहुत सराहा। इसी नई तर्ज के रिकॉर्ड को भारत भेजा गया, तबसे यही हमारी सेना, विदेशी दूतावासों आदि में जरूरी अवसरों पर बजाया जाता है।’
पंडितजी ने जन गण मन और वंदे मातरम् विवाद को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा, ‘यह दुर्भाग्य की बात है कि राष्ट्रगान के रूप में वंदे मातरम् और जन गण मन में एक विवाद सा उत्पन्न हो गया है। इसकी महान ऐतिहासिक परंपरा है। और कोई दूसरा गीत इसे विस्थापित नहीं कर सकता। जहां तक राष्ट्रगान की धुन का सवाल है, यह महसूस किया गया कि शब्दों के अर्थ की बनिस्बत धुन ज्यादा आवश्यक है। यह धुन ऐसी कि भारतीय संगीत और पाश्चात्य संगीत दोनों का प्रतिनिधित्व करती हो, जिससे इसके आर्वेâस्ट्रा और बैंड संगीत दोनों में सरलता से विदेश में उपयोग हेतु बजाया जा सके। अनुभव है कि विदेश में ‘जन गण मन’ की धुन सराही गई है।’ (संविधान सभा वही, २५.८.१९४८) पंडितजी अपनी धुन में थे, धुन ही बहाने का कारण बनी। उन्होंने बैंड, आर्वेâस्ट्रा राग और धुन का बहाना बनाया। लेकिन यदुनाथ भट्ट ने वंदे मातरम् को राग मल्हार में गाया, नोपाल चंद्रधर ने देशमल्हार में और हीराबाई बड़ोदकर ने तिलक कामोद में गाया। वि.दे. अभ्यंकर ने राग खंभावती व कृष्णराव ने राग झिझोडी में गाया। पुलस्कर ने कई राग मिलाकर गाये, ओंकारनाथ ठाकुर ने इसी के लिए नया राग बनाया। लता मंगेशकर ने इसे परवान चढ़ाया। ए.आर. रहमान की संगीत प्रस्तुति को सबने सराहा। पंडितजी ने संविधान सभा (२५.८.१९४८) के वक्तव्य के जरिए जन गण मन को राष्ट्रगान और वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत बताया और बहस को दुर्भाग्यपूर्ण बताया ठीक वैसे ही अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने बिना किसी बहस के ही एक को राष्ट्रगान और दूसरे को राष्ट्रगीत घोषित (२४ जनवरी १९५०) कर दिया। राष्ट्र ने संविधान सभा के निर्देश शिरोधार्य कर लिए पर अलगाववादी तत्वों ने `वंदे मातरम्’ को हिकारत से ही देखा।

(लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)

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