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चीनी दीये-लड़ियों का बहिष्कार करते रहे हिंदुस्थानी, चीन से आयात में भारत बना अव्वल!

-२०२५-२६ में चीन से आया १३१.६३ अरब डॉलर का माल, कुल आयात में हिस्सेदारी १७ फीसदी

कभी दिवाली पर ‘चीनी दीये मत खरीदो’, ‘चाइनीज लाइटों का बहिष्कार करो’ जैसे अभियान चलाकर देशभक्ति का संदेश दिया जाता रहा, लेकिन भारत-चीन व्यापार के आंकड़े एक बिल्कुल अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं। छोटे दुकानदार से लेकर आम ग्राहक तक चीनी खिलौनों, झालरों और सजावटी सामान से परहेज करता रहा, जबकि दूसरी ओर चीन भारत का सबसे बड़ा आयात स्रोत बन गया है।
केंद्र सरकार ने राज्यसभा में बताया है कि वित्त वर्ष २०२५-२६ में चीन से भारत का आयात बढ़कर १३१.६३ अरब डॉलर पर पहुंच गया और देश के कुल आयात में चीन की हिस्सेदारी करीब १७ प्रतिशत हो गई। सरकार ने यह भी माना कि भारत की आयात निर्भरता उसकी तेज आर्थिक वृद्धि, औद्योगीकरण और बढ़ते मैन्युपैâक्चरिंग सेक्टर से जुड़ी हुई है।
वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद के मुताबिक, चीन से केवल तैयार उपभोक्ता वस्तुएं ही नहीं आतीं, बल्कि भारतीय उद्योगों के लिए जरूरी कई महत्वपूर्ण कच्चे माल और इंटरमीडिएट वस्तुओं की आपूर्ति भी वहीं से होती है।
इनमें लिथियम, कोबाल्ट, ग्रेफाइट, दुर्लभ मृदा तत्व और तांबे जैसी अहम सामग्री शामिल हैं।
सरकार का दावा है कि घरेलू विनिर्माण क्षमता और सप्लाई चेन मजबूत कर चीन पर निर्भरता घटाने की कोशिश की जा रही है। इससे पहले भी सरकार संसद में स्पष्ट कर चुकी है कि चीन से आयात पर कोई सामान्य प्रतिबंध नहीं लगाया गया है और जरूरत के मुताबिक, राष्ट्रीय हित में कदम उठाए जाते हैं।
लेकिन आंकड़े बड़ा सवाल छोड़ते हैं, क्या चीन का आर्थिक बहिष्कार सिर्फ आम आदमी के दीये, खिलौने और झालरों तक सीमित रह गया, जबकि उद्योग और अर्थव्यवस्था की बड़ी जरूरतें लगातार चीनी माल पर निर्भर होती चली गईं?
चीन ने दिखा दिया, झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए!
चीन ने दुनिया को यह दिखा दिया कि किसी देश की असली ताकत केवल उसकी सेना, आबादी या राष्ट्रवादी नारों में नहीं होती, बल्कि उसकी शिक्षा, तकनीक, प्रतिभा, उत्पादन क्षमता, दीर्घकालिक योजना और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में होती है। जिस चीन को कभी सस्ते सामान का कारखाना कहकर खारिज किया जाता था, वही आज इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सौर ऊर्जा, ड्रोन, हाई-स्पीड रेल, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रेयर अर्थ जैसे क्षेत्रों में दुनिया की बड़ी शक्तियों को चुनौती दे रहा है। कोई लाख चाह कर भी चीनी वस्तुओं से मुंह नहीं मोड सकता। चीन से आयात करना हमने अपनी मजबूरी बना लिया है। हम सिर्फ आत्मनिर्भरता के नारे लगाते हैं पर चीन ने साबित कर दिया है कि वो न केवल आत्मनिर्भर है बल्कि पूरा भारत, पूरी दुनिया उस पर निर्भर है।
और हम? हम आज भी जाति-पांति के हिसाब-किताब, धर्म की दीवारों, नफरत की राजनीति और इतिहास के अनंत झगड़ों में अपनी ऊर्जा खपा रहे हैं। जिस समय दुनिया विश्वविद्यालयों, प्रयोगशालाओं और स्टार्टअप में भविष्य गढ़ रही है, हमारे यहां अक्सर शिक्षा से अधिक शोर, वैज्ञानिक सोच से अधिक राजनीतिक तमाशा और प्रतिभा को अवसर देने से अधिक उसकी जाति, भाषा, विचार और पहचान तलाशने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।
किसी भी देश को चीन से मुकाबला करना है तो चीनी सामान के बहिष्कार के नारे पर्याप्त नहीं होंगे। चीन को मात बाजार में, पैâक्टरी में, प्रयोगशाला में, विश्वविद्यालय में और पेटेंट की दौड़ में देनी होगी। इसके लिए ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो आलोचना से घबराए नहीं, प्रतिभा को कुचले नहीं, शिक्षा को खर्च नहीं बल्कि निवेश समझे और युवाओं के हाथ में नफरत का झंडा नहीं बल्कि हुनर, विज्ञान और रोजगार का औजार दे। दुनिया भावनाओं के आगे नहीं, ताकत और क्षमता के आगे झुकती है और क्षमता नारों से नहीं, राष्ट्र निर्माण की सकारात्मक सोच से पैदा होती है।

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