राजन पारकर
नीट विवाद ने आखिरकार सत्ता के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले गलियारों तक दस्तक दे दी। महीनों तक सरकार यह संदेश देती रही कि सब कुछ नियंत्रण में है, लेकिन राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ता गया। सूत्रों के अनुसार, आंदोलन को शुरुआती दौर में हल्के में लिया गया। सत्ता के रणनीतिकारों को लगा कि कुछ दिनों में विरोध शांत हो जाएगा। लेकिन जब छात्रों का गुस्सा, सामाजिक संगठनों की आवाज और विपक्ष का हमला एक मंच पर दिखाई देने लगा, तब दिल्ली के बंद कमरों में बेचैनी बढ़ने लगी। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि इस्तीफा केवल नैतिक जिम्मेदारी का मामला नहीं, बल्कि बढ़ते राजनीतिक दबाव को कम करने की कोशिश भी माना जा रहा है, `जब सत्ता जनता की आवाज सुनना बंद कर देती है, तब जनता सत्ता को सुनाने के लिए सड़क पर उतरती है।’ अब सवाल यह नहीं कि एक मंत्री गया, बल्कि सवाल यह है कि अगली बारी किसकी है?
`यह अंत नहीं… राजनीतिक हिसाब-किताब की शुरुआत!’
विपक्ष ने इस इस्तीफे को लोकतंत्र की जीत बताया है। सत्ता पक्ष इसे सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया कह रहा है। लेकिन चर्चा है कि असली लड़ाई अभी बाकी है। दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में कहा जा रहा है कि सरकार अब नुकसान नियंत्रित करने की रणनीति बना रही है। दूसरी ओर विपक्ष इस मुद्दे को आने वाले चुनावों तक जीवित रखना चाहता है। सूत्र बताते हैं कि कुछ नेताओं का मानना है कि यदि आंदोलन पहले गंभीरता से लिया गया होता तो शायद यह नौबत नहीं आती। `जब सत्ता अहंकार के घोड़े पर सवार हो जाती है, तब जनता उसे लोकतंत्र की सड़क पर उतारना जानती है।’ अब चर्चा सिर्फ इस्तीफे की नहीं, बल्कि सरकार की राजनीतिक विश्वसनीयता की हो रही है।
`दिल्ली की दौड़ और सत्ता के बंद कमरों की बेचैनी!’
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद दिल्ली में राजनीतिक गतिविधियां अचानक तेज हो गर्इं। नेताओं की आवाजाही बढ़ी, बैठकों का दौर शुरू हुआ और अटकलों का बाजार गर्म हो गया। सूत्रों के अनुसार, कई राज्यों के वरिष्ठ नेताओं को तत्काल दिल्ली बुलाए जाने की चर्चा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केंद्र अब केवल शिक्षा मंत्रालय नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक संदेश देने की तैयारी में है। कानाफूसी यह भी है कि आने वाले दिनों में संगठन और सरकार, दोनों स्तरों पर कुछ बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। कौन नाराज है, किस मंत्री का विभाग बदल सकता है और किस अधिकारी की कुर्सी डोल रही है, इन सवालों के जवाब अभी सत्ता के बंद कमरों में कैद हैं।
