मुंबई: मुंबई उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र में स्लम पुनर्विकास व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और नागरिक हितैषी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को महाराष्ट्र स्लम क्षेत्र (सुधार, सफाया एवं पुनर्विकास) अधिनियम, 1971 की व्यापक समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति जी. एस. कुलकर्णी और न्यायमूर्ति अद्वैत एम. सेठना की खंडपीठ ने दिया।
न्यायालय ने कहा कि स्लम पुनर्विकास परियोजनाओं में लगातार हो रही देरी, पारदर्शिता की कमी, पुनर्वास इमारतों में बढ़ती भीड़, स्लम घोषित किए जाने को लेकर विवाद तथा प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र के अभाव के कारण नागरिकों को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए वर्तमान कानून में व्यापक सुधार समय की आवश्यकता है।
खंडपीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि गठित की जाने वाली विशेषज्ञ समिति आधुनिक तकनीक के माध्यम से स्लम क्षेत्रों की सटीक पहचान, समय पर अंतरिम पुनर्वास की व्यवस्था, पुनर्विकास परियोजनाओं में जनसंख्या घनत्व का नियमन, निजी भूमि मालिकों के अधिकारों की सुरक्षा, निर्माण गुणवत्ता की निगरानी तथा पारदर्शी और प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था विकसित करने संबंधी सिफारिशें तैयार करे। समिति को अपना विस्तृत प्रतिवेदन दस माह के भीतर राज्य सरकार को सौंपना होगा।
इस महत्वपूर्ण मामले में न्यायालय के एमिकस क्यूरी (न्यायमित्र) के रूप में वरिष्ठ अधिवक्ता डेरियस खंबाटा ने न्यायालय की सहायता की। वहीं स्लम पुनर्वसन प्राधिकरण (एसआरए) की ओर से डॉ. बिरेन्द्र सराफ, नारेडको वेस्ट फाउंडेशन की ओर से अधिवक्ता मयूर खांडेपारकर, बृहन्मुंबई महानगरपालिका की ओर से अधिवक्ता जोएल कार्लोस, ए. एच. वाडिया ट्रस्ट की ओर से अधिवक्ता लेवी रुबेन्स तथा झोपड़पट्टी निवासियों की ओर से अधिवक्ता मिहिर देसाई ने न्यायालय के समक्ष अपने-अपने पक्ष प्रभावी ढंग से रखे।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने स्पष्ट किया कि शहरी विकास के साथ-साथ प्रत्येक नागरिक को सम्मानजनक आवास का संवैधानिक अधिकार सुनिश्चित करना राज्य का दायित्व है। इसलिए स्लम पुनर्विकास प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी, समयबद्ध और नागरिक-केंद्रित बनाने के लिए आवश्यक कानूनी सुधारों को शीघ्र लागू किया जाना चाहिए।
मुंबई उच्च न्यायालय के इस फैसले को महाराष्ट्र की स्लम पुनर्विकास नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे भविष्य में पुनर्विकास परियोजनाओं में पारदर्शिता बढ़ने, निर्माण गुणवत्ता में सुधार होने तथा स्लमवासियों और अन्य हितधारकों के अधिकारों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित होने की उम्मीद जताई जा रही है।
