सुनील ओसवाल
कुंभ के बहाने तपोवन हड़पने की साजिश
हजारों पेड़ों की बलि
तपोवन की मिट्टी में बरसों से खड़े वे पेड़ आज पहली बार डर में हैं। आरी की आवाज अभी आई नहीं, लेकिन उनके चारों ओर खामोशी में एक अजीब-सी बेचैनी तैरती है…मानो शहर की धड़कन ही धीमी पड़ी हो। यह कहानी सिर्फ पेड़ गिरने की नहीं, बल्कि उस भरोसे के टूटने की है, जो नागरिकों और प्रशासन के बीच कभी खड़ा था।
सिंहस्थ कुंभ के नाम पर नासिक में कामों की रफ्तार तेज हुई, पर रफ्तार के साथ एक और चीज बढ़ी मनमानी। तपोवन के साधुग्राम के लिए १,८२५ पेड़ों को काटने का निर्णय लिया गया। कागज पर नियम निभाए गए।
पेड़ों पर पीले निशान, हरकतियां मांगने का नोटिस, प्राधिकरण का सर्वे… लेकिन शहर को जल्दी ही समझ आ गया कि पैâसला पहले ही हो चुका है और यह पूरी प्रक्रिया सिर्फ औपचारिकता है।
पीला निशान सिर्फ पेड़ों पर नहीं लगाया गया था, वह निशान था शहर की आवाज पर, उस वातावरण पर, जिसने नासिक को नासिक बनाया।
नागरिकों ने हरकतियां दीं… सैकड़ों, हजारों। प्रशासन के टेबल पर कागज बढ़ते गए, पर नीयत नहीं बदली और तभी शहर ने सड़क चुनी। महिलाएं, बुजुर्ग, विद्यार्थी—सभी ने एक स्वर में कहा, ‘विकास चाहिए, पर विनाश नहीं।’
लेकिन असली झटका तब लगा जब तपोवन की ५४ एकड़ भूमि में से ३५ एकड़ पर २२० करोड़ रुपए का स्थायी माईस (एमआईसीई) हब बनाने का टेंडर सामने आया। तीन भव्य प्रदर्शन हॉल, दो बैंक्वेट, रिटेल जोन, फूड कोर्ट, मनोरंजन क्षेत्रष्ठ और ये सब ३३ साल के लिए एक निजी संस्था को। सवाल बड़ा था, क्या साधुग्राम सिर्फ बहाना है? क्या वृक्षतोड़ सिर्फ शुरुआत है?
पर्यावरणप्रेमियों का आरोप स्पष्ट है, ‘पेड़ रास्ते में नहीं हैं, ये योजनाएं रास्ता बदल रही हैं।’
आज तपोवन में खड़े हर पेड़ की जड़ में एक सवाल है, क्या विकास जनता की सहमति से होगा या जनता के सिर पर थोप दिया जाएगा?
नासिक की सड़कों पर उठ रही आवाज यही कह रही है, ‘हमारी हवा मत छीनो, हमारा साया मत काटो। विकास चाहिए, लेकिन दिल तोड़कर नहीं।’
और अब यह लड़ाई पेड़ों की नहीं रही, यह लड़ाई है मनमानी पर रोक लगाने की। नासिक ने तय कर लिया है, जहां भरोसा कटेगा, वहां आंदोलन उगेगा।
तपोवन के पेड़ों का दुख सिर्फ हरियाली का नुकसान नहीं, यह उस ताने-बाने का टूटना है, जिसमें शहर की संस्कृति, आस्था और प्रकृति एक साथ सांस लेती आई है। नासिककर जानते हैं कि सिंहस्थ आएंगे-जाएंगे.. लेकिन जो पेड़ गिरेंगे, वे कभी वापस नहीं आएंगे।
