-५ करोड़ रुपए हुआ था खर्च
-सफाई कर्मचारियों की कमी से पैदा हुई स्थिति
धीरेंद्र उपाध्याय
सेंट जॉर्ज अस्पताल का ३० बेड का मनोरोग वार्ड, चतुर्थ श्रेणी कर्मियों की कमी से ‘भूतिया’ बन गया। आरटीआई के अनुसार, मानसिक रोगों से मौतें २०१९‑२०२३ में २६ से १९१९ तक बढ़ी, ६१ प्रतिशत नशे से सरकार पर प्रशासनिक विफलता के चलते बजट पर रोक के कारण पद खाली हैं, गरीब मरीज निजी अस्पतालों में महंगा इलाज करने पर मजबूर हैं।
ब्रिटिशकाल से शहर की चिकित्सा व्यवस्था का आधार रहे मंबई के सेंट जॉर्ज सरकारी अस्पताल आज शासन-प्रशासन की अनदेखी के चलते मानो घोटाले का प्रतीक बन गया है, जिसे महीनों से ढकने की भरसक कोशिश हो रही है। अस्पताल में पूर्ण रूप से निर्मित ३० बेड का आधुनिक मनोरोग वार्ड सिर्फ चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की कमी की मार झेल रहा है। आलम यह है कि पांच करोड़ की लागत से बना यह वार्ड ‘भूतिया’ लगने लगा है।
उल्लेखनीय है कि एक आरटीआई से खुलासा हुआ था कि महाराष्ट्र में मानसिक मामलों में बेतहाशा वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष २०१९ में मानसिक रोगों से २६ मौतें हुई थीं, जो वर्ष २०२३ में बढ़कर १९१९ हो गईं। इनमें से ६१ फीसदी मौतें नशीले पदार्थों के सेवन से हुई हैं। इस गंभीर संकट के बावजूद सरकारी अस्पताल का मनोरोग वार्ड धूल खा रहा है। चिकित्सा शिक्षा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि मेडिकल कॉलेजों में चतुर्थ श्रेणी के २,२०० पद पिछले दो साल से खाली पड़े हैं। वित्त विभाग बजट का हवाला देकर नियुक्तियों को रोक रहा है। यह सच्चाई जनता से छुपाई जा रही है।
मरीजों को मजबूरन निजी अस्पतालों का
करना पड़ रहा रुख
कफ परेड स्थित एक मनोचिकित्सक डॉ. राजीव शर्मा ने बताया कि सरकारी अस्पताल में बेड न मिलने के कारण गरीब मरीज ५,०००-७,००० रुपए प्रतिदिन के हिसाब से निजी अस्पतालों में भर्ती होने को मजबूर हैं। कई मरीज तो बीच में ही इलाज छोड़कर घर लौट जाते हैं।
सरकार पर तीखा हमला
विपक्ष ने इस स्थिति को निंदनीय बताते हुए कहा है कि एक तरफ सरकार मानसिक स्वास्थ्य अभियान चलाती है, दूसरी तरफ तैयार वार्ड कर्मचारियों की मार झेल रहा है। यह प्रशासनिक विफलता की पराकाष्ठा है।
स्वास्थ्य विभाग और वित्त विभाग में तालमेल की कमी
सूत्रों के अनुसार, स्वास्थ्य विभाग ने कई बार चतुर्थ श्रेणी के पदों के लिए प्रस्ताव भेजा, लेकिन वित्त विभाग ने बजट का हवाला देकर इन्हें ठुकरा दिया। इस बीच मानसिक रोगियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
सरकार की खोखली हकीकत
इस पूरे मामले ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की खोखली हकीकत को उजागर कर दिया है। जहां एक तरफ सरकार महंगे मेडिकल उपकरण खरीद रही है, वहीं दूसरी तरफ बुनियादी सुविधाओं के अभाव में मरीजों को इलाज से वंचित रहना पड़ रहा है। इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता है, वरना मानसिक स्वास्थ्य संकट महामारी का रूप ले सकता है।
