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तहकीकात : पुलिस वाले भी प्यार करते हैं… पर टूटते भी हैं… हथियार और टूटा हुआ दिल साथ-साथ

फिरोज खान

लोक भवन की १०वीं मंजिल। चारों तरफ वर्दी, अनुशासन और बंदूकें। इन्हीं दीवारों के बीच मंगलवार की रात २६ वर्षीय एसआरपीएफ जवान कौस्तुभ सांगले ने अपनी सरकारी राइफल से खुद को गोली मार ली। पीछे छूट गई एक डायरी, जिसके पन्नों में एक टूटे रिश्ते का दर्द दर्ज था।
हम अक्सर कहते हैं कि पुलिस वाले सख्त होते हैं, उनमें भावनाएं नहीं होतीं। लेकिन कौस्तुभ की मौत ने एक बार फिर याद दिलाया कि वर्दी के भीतर भी एक इंसान होता है। वह भी प्यार करता है, उम्मीदें रखता है और रिश्ते टूटने का दर्द महसूस करता है। करीब तीन साल पहले प्रशिक्षण के दौरान उनकी एक महिला कांस्टेबल से मुलाकात हुई। दोस्ती हुई, जो बाद में प्रेम संबंध में बदल गई। नौकरी मिलने के बाद कौस्तुभ ने शादी का प्रस्ताव रखा, लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया गया। इसके बाद दोनों के बीच तनाव बढ़ा। महिला कांस्टेबल ने कथित तौर पर उनके लगातार संपर्क करने और पीछा करने की शिकायत भी दर्ज कराई। लगभग दो महीने पहले कौस्तुभ को पता चला कि महिला की अरेंज मैरिज हो चुकी है। बताया जाता है कि इसके बाद वो मानसिक रूप से काफी परेशान रहने लगे।
यह सवाल सिर्फ कौस्तुभ का नहीं है। हम अपने जवानों से १२ से १४ घंटे की ड्यूटी, त्योहारों पर भी परिवार से दूर रहने और हर परिस्थिति में मजबूत बने रहने की अपेक्षा करते हैं। लेकिन क्या उन्हें मानसिक स्वास्थ्य संबंधी पर्याप्त सहायता मिलती है? क्या नियमित काउंसलिंग, मनोवैज्ञानिक सहयोग और तनाव प्रबंधन की व्यवस्था पर्याप्त है? अक्सर मानसिक तनाव को कमजोरी मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। एक और अहम सवाल यह भी है कि क्या मानसिक तनाव से जूझ रहे जवानों की समय-समय पर मनोवैज्ञानिक जांच की कोई प्रभावी व्यवस्था है? ड्यूटी के दौरान हथियार जरूरी हैं, लेकिन क्या ऐसे मामलों में जोखिम का आकलन करने के लिए पर्याप्त तंत्र मौजूद है? यह भी विचार करने की जरूरत है कि जब किसी जवान के व्यवहार में स्पष्ट बदलाव दिखाई दे या उसके खिलाफ शिकायत आए, तब केवल अनुशासनात्मक कार्रवाई ही नहीं, बल्कि काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य सहायता पर भी समान रूप से ध्यान दिया जाए।
कौस्तुभ के आचरण का कानूनी और विभागीय मूल्यांकन अपने स्थान पर होगा, लेकिन इतना तय है कि वर्दी पहन लेने से किसी का दिल पत्थर का नहीं हो जाता। पुलिसकर्मी भी घर-परिवार को याद करते हैं, रिश्तों के टूटने का दर्द महसूस करते हैं और भावनात्मक संघर्ष से गुजरते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि आम लोग अक्सर अपना दर्द दोस्तों या परिवार से साझा कर लेते हैं, जबकि कई पुलिसकर्मी अपनी वर्दी के साथ अपना दर्द भी भीतर ही दबाकर जीते रहते हैं। लोक भवन की दीवारों ने शायद उस गोली की आवाज सुनी होगी, लेकिन समाज के रूप में हमारे सामने बड़ा सवाल यह है कि क्या हम ऐसा संवेदनशील तंत्र विकसित कर सकते हैं, जहां हर वर्दीधारी को समय रहते मानसिक सहारा और जीने की नई उम्मीद मिल सके?

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