-४५ दिनों के फुटेज में करीब ७० बार चोरी, फिर भी जिम्मेदारों पर खामोशी
-एक आरोपी कैमरे की ओट बनाता, दूसरा नोटों की गड्डियां लेकर निकल जाता
-चोरी की भनक लगने के बाद संदिग्ध कर्मचारी क्यों नहीं हटाए गए?
– बिना तलाशी गणना कक्ष से बाहर जाने की छूट किसके आदेश पर थी?
– सीसीटीवी की निगरानी करनेवाले अधिकारी ७० संदिग्ध घटनाएं क्यों नहीं पकड़ सके?
– जिन पर पर्यवेक्षण की जिम्मेदारी थी, उनके खिलाफ एफआईआर क्यों नहीं हुई?
सामना संवाददाता / अयोध्या
राम मंदिर में भक्तों द्वारा श्रद्धा से अर्पित की गई धनराशि पर कोई एक दिन अचानक हाथ नहीं साफ हुआ था। एसआईटी की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट की एक-एक पंक्ति इस बात की ओर इशारा करती है कि चढ़ावे की चोरी लगातार, योजनाबद्ध और बेखौफ तरीके से की जाती रही। आरोपी कभी नोटों की पूरी गड्डियां कपड़ों में छिपाते, कभी खुले नोट जेबों में भरते और यहां तक कि जूतों में रकम दबाकर गणना कक्ष से बाहर निकल जाते थे।
चौंकानेवाली बात
सबसे चौंकानेवाली बात यह है कि यह सब उस सुरक्षित माने-जानेवाले गणना कक्ष में होता रहा, जहां सीसीटीवी वैâमरे, बैंक अधिकारी, ट्रस्ट प्रतिनिधि और निजी सुरक्षा कर्मचारी मौजूद थे। इसके बावजूद न तो आरोपियों को प्रवेश के समय ठीक से जांचा गया और न बाहर निकलते समय उनकी तलाशी ली गई।
४५ दिनों में करीब ७० बार चोरी!
एसआईटी को अयोध्या के राम मंदिर में नोटों की गणना कक्ष के केवल २७ अप्रैल से ५ जून २०२६ तक के सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध हो सके। इन ४५ दिनों की रिकॉर्डिंग में करीब ७० संदिग्ध चोरी की घटनाएं सामने आने की बात कही गई है। रिपोर्ट में चोरी को आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि बार-बार दोहराया गया आपराधिक कृत्य माना गया है।
आरोपी समूह बनाकर नोटों की गिनती करते थे। एक कर्मचारी सीसीटीवी वैâमरे और अधिकारियों की नजर से बचने के लिए ओट तैयार करता था, जबकि दूसरा नोटों की गड्डियां अथवा खुले नोट अपने कपड़ों में छिपा लेता था। कई मौकों पर आरोपी गणना कक्ष के भीतर और बाहर बेखौफ घूमते दिखाई दिए।
सीसीटीवी रिकॉर्डिंग में आरोपी कथित रूप से नोटों की गड्डियां अपनी कमीज, पैंट और अन्य वस्त्रों में रखते दिखाई दिए। कुछ दृश्यों में नकदी जूतों में छिपाने के संकेत भी मिले। ट्रस्ट प्रतिनिधियों ने भी जांचकर्ताओं को एक अलग रिकॉर्डिंग सौंपी थी, जिसमें कर्मचारियों को धनराशि छिपाते हुए देखे जाने का दावा किया गया। एसआईटी ने माना कि आरोपियों की नकदी तक सीधी पहुंच थी। वे नोटों की गड्डियों के बिल्कुल पास बैठते थे और गणना कक्ष में मोबाइल फोन तथा निजी सामान भी ले जाते थे। सुरक्षा नियम पुस्तकों में मौजूद थे, लेकिन जमीन पर उनका पालन लगभग नहीं हो रहा था।
बिना तलाशी आते-जाते रहे आरोपी
गणनाकर्मियों की न तो प्रवेश द्वार पर तलाशी होती थी और न काम खत्म होने के बाद बाहर निकलते समय। निजी सुरक्षा एजेंसी के कर्मचारी उन्हें बिना किसी गंभीर जांच के आने-जाने देते थे। रिपोर्ट में यह गंभीर टिप्पणी की गई कि निर्धारित सुरक्षा उपायों का पालन करानेवाले जिम्मेदार व्यक्तियों ने पर्यवेक्षण में भारी चूक की। इसी लापरवाही ने आरोपियों को बार-बार आपराधिक कृत्य करने का दुस्साहस दिया। सवाल यह है कि सुरक्षाकर्मियों को तलाशी न लेने का निर्देश किसने दिया? किस अधिकारी ने ऐसी व्यवस्था को महीनों तक चलने दिया? और बार-बार संदेह सामने आने के बावजूद सुरक्षा प्रोटोकॉल तत्काल क्यों नहीं बदले गए?
एसबीआई ने पहले ही जताया था संदेह
जांच में यह बात भी सामने आई कि चढ़ावे में गड़बड़ी की आशंका पहले ही पैदा हो गई थी। भारतीय स्टेट बैंक से जुड़े अधिकारियों ने कथित रूप से कुछ गणनाकर्मियों के व्यवहार पर सवाल उठाए थे और उन्हें हटाने की जरूरत बताई थी। इसके बावजूद कुछ कर्मचारियों को हटाने के प्रस्ताव पर ट्रस्ट से जुड़े जिम्मेदार लोग कथित रूप से सहमत नहीं हुए। ऐसा क्यों किया गया, इसका स्पष्ट जवाब अब तक सामने नहीं आया है। एसआईटी ने एसबीआई की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। बैंक पर गणना प्रक्रिया की निगरानी, मशीनों की जांच, बाहरी कर्मचारियों पर नियंत्रण और सुरक्षा नियमों का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी थी। जांच में पाया गया कि इन जिम्मेदारियों का समुचित निर्वहन नहीं हुआ।
एसआईटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि गड़बड़ी केवल नकदी की गणना तक सीमित नहीं थी। मंदिर में आनेवाले सोने-चांदी के आभूषणों और अन्य बहुमूल्य वस्तुओं के प्रबंधन में भी गंभीर प्रणालीगत कमियां मौजूद थीं। इसका अर्थ है कि चोरी का खतरा केवल नोटों की गड्डियों तक नहीं था। श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाई गई कीमती वस्तुओं की प्राप्ति, सूची तैयार करने, भंडारण और सुरक्षा की पूरी व्यवस्था में सुधार की जरूरत थी।
८ आरोपी जेल में, बड़े जिम्मेदार बाहर
एसआईटी की प्रारंभिक रिपोर्ट के बाद २५ जून को आठ लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। इनमें अनुकल्प मिश्रा, अविनाश, रमाशंकर मिश्रा, रमाशंकर उर्फ टिन्नू, लवकुश और अन्य आरोपी शामिल बताए गए हैं। सभी आठ आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और पुलिस उनके तथा परिजनों से जुड़े करीब ५० बैंक खातों की जांच कर रही है। पुलिस ने नकदी, आभूषण और वाहन बरामद करने का दावा भी किया है। अब यह पता लगाया जा रहा है कि चुराई गई रकम कहां-कहां खर्च हुई, किन खातों में पहुंची और क्या इस नेटवर्क में कुछ अन्य लोग भी शामिल थे, लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी बरकरार है। छोटे गणना कर्मचारी तो जेल पहुंच गए, मगर जिन अधिकारियों और पदाधिकारियों पर सुरक्षा, निगरानी और व्यवस्था का दायित्व था, उनके खिलाफ क्या हुआ?
रिपोर्ट में नाम, कार्रवाई में विराम
एसआईटी ने ट्रस्ट के पूर्व पदाधिकारी डॉ. अनिल मिश्रा और गणना व्यवस्था से जुड़े जिम्मेदारों की पर्यवेक्षणीय भूमिका पर सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट में सुरक्षा उपाय लागू न करने और नकदी की सुरक्षा सुनिश्चित न कर पाने को गंभीर चूक माना गया है। इसके बावजूद अब तक मुख्य कार्रवाई आठ कर्मचारियों तक सीमित दिखाई देती है। निजी सुरक्षा एजेंसी के उन कर्मचारियों पर भी किसी बड़ी कार्रवाई की स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई, जो गणनाकर्मियों को बिना तलाशी बाहर जाने देते थे।
इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या इस मामले में केवल चोरी करनेवाले हाथ पकड़े जाएंगे या उन आंखों की भी जवाबदेही तय होगी, जो सब कुछ होते हुए देखती रहीं?
४५ दिन से पहले का फुटेज कहां गया?
सीसीटीवी प्रणाली में केवल सीमित अवधि का फुटेज सुरक्षित रहने के कारण एसआईटी अब २७ अप्रैल से पहले की रिकॉर्डिंग का बैकअप हासिल करने का प्रयास कर रही है। जांचकर्ताओं को आशंका है कि चोरी की शुरुआत उपलब्ध फुटेज की अवधि से काफी पहले हो चुकी होगा। यदि पुरानी रिकॉर्डिंग नहीं मिलती तो चोरी की असली अवधि और कुल धनराशि का पता लगाना बेहद कठिन हो सकता है। जांच रिपोर्टों में भी यह आशंका जताई गई है कि गबन की वास्तविक रकम शायद कभी पूरी तरह सामने न आ पाए।
चोरी रुकी तो आधे गणनाकर्मी चले गए!
चोरी प्रकरण सामने आने के बाद मंदिर में दान की गिनती के नियम बदले गए हैं। कर्मचारियों की कड़ी तलाशी, डिजिटल पहचान पत्र, सीसीटीवी निगरानी और नई प्रशासनिक व्यवस्था लागू की गई। इन कठोर नियमों के बाद गणना से जुड़े आधे से अधिक कर्मचारियों के काम छोड़ने की खबर ने संदेह और गहरा कर दिया है।
