सामना संवाददाता / नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना का कहना है कि पैâसलों को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि उन्हें लिखने वाले जज बदल गए या रिटायर हो गए हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पैâसलों को पलटने की हाल की घटनाओं पर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि कोर्ट के पैâसले समय के साथ टिकने चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता का मतलब है कि एक बार दिया गया पैâसला पक्का होना चाहिए, क्योंकि वह स्याही से लिखा गया है, रेत पर नहीं।
जस्टिस नागरत्ना ने ये बात हरियाणा के सोनीपत में ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में कही। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक स्वतंत्रता और कानून की सर्वोच्चता मिलकर यह सुनिश्चित करती है कि किसी भी समय मौजूद राजनीतिक दबाव के कारण कानून का शासन कमजोर नहीं होगा। उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों को राजनीतिक और बाहरी प्रभाव से बचाना इस उद्देश्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है इसलिए ये दोनों अवधारणाएं विधि के शासन के लिए महत्वपूर्ण आधार हैं, जिन्हें कमतर नहीं आंक सकते हैं। उन्होंने कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता की विकसित समझ यह अपेक्षा करती है कि हमारा विधिक तंत्र यह आश्वासन दे कि किसी न्यायाधीश द्वारा दिया गया पैâसला समय की कसौटी पर कायम रहे, क्योंकि वह स्याही से लिखा जाता है रेत पर नहीं। जस्टिस ने कहा कि कानून का शासन दोहरे विश्वास पर आधारित एक दृष्टिकोण है।
फैसले का सम्मान करें
उन्होंने कहा कि कानूनी बिरादरी और शासन व्यवस्था से जुड़े सभी लोगों का यह कर्तव्य है कि वे पैâसले का सम्मान करें। अगर कोई आपत्ति हो तो उसे कानून में तय परंपराओं के अनुसार ही उठाएं और सिर्फ इसलिए पैâसले को खारिज करने की कोशिश न करें कि अब चेहरे बदल गए हैं।
