समय-समय की बात!

कभी अंधेरे में हुए पाप की
गवाही दे न पाते थे लोग,
आज खिली धूप में हो रहे बलात्कार का
चश्मदीद गवाह चंद रुपयों में बिक जाता है।
कैसा समय आया है।

एक बूंद रक्तबीज से
भरपूर फसलें उग जाती हैं
देशी और विदेशी धरती से
खूनी रंजिशें रची जा रही हैं।
समय पर रंगत लाल चढ़ गई है।

पहाड़ की चट्टानी, कड़ी भूमि पर
एक कुदाली क्या कमाल कर लेगी,
इत्र बनाने के लिए
कितने गुलाब उगा लोगे।
समय का पर्यावरण हमने बिगाड़ा है।

नागों की आबादी के पास
सपेरों की बस्तियां होती थीं।
आज केवल दो-मुंहे सांप पल और जी रहे हैं।
समय ने व्यवहार बदल दिया है।

चरखे, चक्की, रहट की जादुई आवाज
हमारी पीढ़ी ही भूल गई है।
आज के बच्चे तो ऐसी लोरी की
कल्पना ही नहीं कर सकते।
समय शोरगुल पसंद करता है।

पहले घरों की दहलीज कुंवारी नहीं रहती थी।
ब्याह कर आई बहू सर्वप्रथम
दहलीज पर टेक माथा करती थी गृह प्रवेश।
दहलीज पर माथा टेक
एक न एक बेटी का कन्यादान होता था,
रुलाती आंखों के बीच डोली उठ जाती थी।

आज वही डोलियां म्यूजियम में रखी मिलेंगी।
मां पुरानी पेटी से एक सलवटों वाली
कोरी साड़ी बेटी के बक्से में रख देती है।
आज ब्रांडेड न हो तो
बेटी मां से उलझ जाती है।
समय दिखावे का हो गया है।

मेहमानों के आने की आस
परिवार में बंधी रहती थी।
अब आए हुए कब जाएंगे, इसकी
बेचैनी डराती रहती है।

समय-समय पर समय की रंगत अलग होती है,
बस बात यहीं पर आकर रुक जाती है।

बेला विरदी।

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