मनमोहन
अरे बैठिए-बैठिए… जरा चाय की चुस्की लीजिए और इत्मीनान से समझिए इस पूरे खेल को। देख रहे हैं न, क्या गजब का ऑस्कर-विनिंग ड्रामा सेट किया है हमारे सिस्टम के डायरेक्टरों ने! पर्चा लीक क्या हुआ, मानो ‘गंगाजल’ की स्क्रिप्ट लाइव चल रही हो। जब करोड़ों युवा सड़क पर आकर शिक्षा मंत्री की कुर्सी हिलाने लगे, तो पीछे बैठे आकाओं को लगा, ‘बुड़बक, ई तो सीधे छाती पर चढ़ आया सब!’ बस, वहीं से इस खेल की एक-एक चाल शुरू हुई।
पहले गोदी मीडिया को उतारा गया, जिन्होंने शिक्षकों को ‘दो कौड़ी का’ बताकर सीधे अपनी ‘औकात’ दिखा दी। जब जनता ने उन्हें सोशल मीडिया पर सरेआम धोया, तो वो पतली गली से निकलकर सारा ठीकरा ‘कोचिंग माफिया’ के सिर फोड़ भाग खड़ी हुर्इं। लेकिन असली ‘ब्रह्मास्त्र’ तो अभी बाकी था। छात्रों की एकता तोड़ने के लिए बिहार का सबसे फेवरिट और कड़क तड़का लगाया गया, जाति और धर्म का!
जो बच्चे कल तक ‘रोजगार और री-एग्जाम’ चिल्ला रहे थे, उन्हें अचानक याद दिलाया गया कि अरे पगला! खान सर और रोशन आनंद सर की जाति-धर्म क्या है? फिर क्या था? कल तक जो मीडिया ‘खान सर-खान सर’ जपते नहीं थकता था, वो अचानक थंबनेल पर ‘पैâसल खान’ लिखकर जिहाद का एंगल ढूंढने लगा। चंद डॉलर्स के भूखे यूट्यूबर्स ने भी इस बहती गंगा में जमकर लोटा डुबोया। गुरुओं को यादव, भूमिहार और हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से ऐसा दिखाया गया कि छात्र आपस में ही ‘कपार फोरव्वल’ (सिर फुटौव्वल) करने लगे। असली बात तो ई है भैया कि मंडल-कमंडल वाली इस भज-मंडली को देश में ‘पढ़ा-लिखा’ युवा चाहिए ही नहीं। तभी तो पिछले साल हजारों स्कूल बंद कर दिए गए। उन्हें पता है कि अगर युवा पढ़ गया, तो नौकरी मांगेगा, सवाल पूछेगा। इससे अच्छा है कि उसे हिंदू-मुस्लिम के ‘झुनझुने’ के साथ उलझाए रखो।
पर्चा लीक करने वाले मजे में हैं और हमारा छात्र आज भी सड़क पर बैठकर अपनी जवानी और भविष्य दोनों का ‘दही’ जमा रहा है। पूरा प्लानिंग एकदम सॉलिड है बाबू! कहना पड़ेगा न बाबू कि गजबे है!
