उमा सिंह
कल दिनभर सोशल मीडिया पर चले दो वीडियो ने मन को व्याकुल कर दिया। ये सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या हमारे देश में अब इंसान होने का कोई मतलब रह गया है या हर दर्द को साबित करने के लिए सबूत जरूरी हो गया है। क्या हमारी व्यवस्था में संवेदनशीलता की जगह अब सिर्फ औपचारिकताएं बची हैं। जहां एक ओर बिहार के कटिहार में एक बीमार आंगनवाड़ी सेविका को सलाइन लगाकर ऑफिस घसीटा गया, ताकि सिस्टम उसकी बीमारी ‘मान’ सके। वहीं ओडिशा में एक भाई को अपनी बहन की मौत साबित करने के लिए उसके कंकाल को कब्र से खोदकर सीधे बैंक तक ले जाना पड़ा। ताकि वह साबित कर सके कि अब उसकी बहन इसी दुनिया में नहीं है। ये सिर्फ दो घटनाएं नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना हैं, जहां संवेदनाएं दम तोड़ चुकी हैं और नियम-कानून ने इंसानियत को कुचल दिया है। सवाल सिर्फ सिस्टम पर नहीं, बल्कि उस समाज पर भी है, जो ऐसी घटनाओं को देखकर भी खामोश रहता है, क्या यह हमारी सामूहिवâ संवेदनहीनता का सबूत नहीं?
दरअसल, बिहार के कटिहार से सामने आई एक घटना ने सरकारी व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर कर दिया है। एक आंगनवाड़ी सेविका को अपनी बीमारी साबित करने के लिए अस्पताल से सीधे सलाइन लगाकर सेंटर पहुंचना पड़ा। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में वह बुरी तरह कांपती हुई नजर आती है, ठीक से चल भी नहीं पा रही होती और उसका पति उसे सहारा देकर किसी तरह कार्यालय तक ले जाता है। वहीं दूसरी ओर एक और चौंकानेवाली घटना ओडिशा से सामने आई, जहां एक व्यक्ति अपनी बहन का कंकाल लेकर बैंक पहुंच गया। वजह सिर्फ एक थी कि सिस्टम को यह साबित करना कि उसकी बहन अब जीवित नहीं है। सोचिए, एक भाई को अपनी बहन की मौत का प्रमाण देने के लिए किस हद तक जाना पड़ा। यह दोनों घटनाएं बता रही हैं कि इंसान की हालत से ज्यादा कागजी प्रमाण की अहमियत है। दोनों घटनाएं अलग-अलग राज्यों की हैं, लेकिन इनकी जड़ एक ही है, एक ऐसा तंत्र जो संवेदनाओं से ज्यादा प्रक्रिया को महत्व देता है। जहां बीमार महिला को आराम देने के बजाय उसे अपनी हालत ‘साबित’ करनी पड़ती है और जहां एक भाई को अपनी बहन के कंकाल के साथ बैंक के चक्कर काटने पड़ते हैं। इन घटनाओं ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि व्यवस्था का मकसद लोगों की मदद करना है या उन्हें और ज्यादा परेशान करना।
