-जेन-जी के आंदोलन पर बहस
-गुस्सा, राजनीति और बदलाव की मांग
मनमोहन सिंह
सीजेपी की अगुवाई में भारतीय युवा यानी जेन जी दिल्ली के जंतर-मंतर मैदान में जमा हुए। भीड़ ने बता दिया कि युवाओं के भीतर एक आक्रोश है। इस आंदोलन को काफी नामचीन व्यक्तियों का समर्थन भी मिला, राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं मिली-जुली रहीं। सीजेपी का कहना है कि वह अब अगली रैली रामलीला मैदान में करेगी। यह एक शुरुआत है। यह एक लोकतांत्रिक अधिकार है, बिगड़े हुए सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाना। लेकिन फिर भी कुछ सवाल हैं जिन पर बात करना जरूरी हो जाता है, दूसरे शब्दों में मुख्य मुद्दे और एक विश्लेषण।
क्या यह ‘अन्ना हजारे आंदोलन २.०’ है?
सोनम वांगचुक जैसे एक सम्मानित और गांधीवादी छवि वाले व्यक्ति का इस आंदोलन से जुड़ना इसे २०११ के अन्ना आंदोलन जैसा नैतिक बल देता है, जिससे कुछ समानताएं दिखाई देती हैं। हालांकि, दोनों आंदोलनों में एक बड़ा अंतर है। अन्ना का आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बहुत बड़ा और व्यापक मध्यमवर्गीय आंदोलन था, जबकि कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) युवाओं और सोशल मीडिया मीम्स से उपजा एक बेहद केंद्रित आंदोलन है। यह सीधे तौर पर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और नीट परीक्षा में हुई गड़बड़ी को लेकर खड़ा हुआ है।
इसके पीछे आम आदमी पार्टी (आप) का हाथ है?
सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके पहले यानी साल २०२० से २०२३ के दौरान ‘आप’ के सोशल मीडिया रणनीतिकार के रूप में काम कर चुके हैं। हालांकि, वर्तमान में इस आंदोलन को सीधे तौर पर ‘आप’ द्वारा फंडिंग दिए जाने या कंट्रोल किए जाने का कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला है। इसके बावजूद राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जरूर है कि यह आंदोलन ‘आप’ के पुराने ‘शिक्षा, युवा और भ्रष्टाचार विरोधी’ एजेंडे को परोक्ष रूप से दोबारा जिंदा करने का जरिया बन सकता है।
पुलिस कार्रवाई में दोहरा रवैया!
इस विश्लेषण में कानून-व्यवस्था और पुलिस के रवैए का एक बड़ा विरोधाभास दिखाया गया है। एक तरफ वडोदरा और अन्य शहरों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को विरोध प्रदर्शन शुरू करने से पहले ही हिरासत में ले लिया गया या उन पर पानी की बौछारें की गर्इं। दूसरी तरफ, दिल्ली के जंतर-मंतर पर सीजेपी और सोनम वांगचुक के आंदोलन को बाकायदा अनुमति मिली और वहां का माहौल शांतिपूर्ण रहा। इसका कारण यह हो सकता है कि सरकार एक तेजी से वायरल हो रहे युवाओं के सोशल मीडिया आंदोलन को दबाकर उन्हें और ज्यादा नाराज नहीं करना चाहती, जबकि पारंपरिक विपक्षी दलों से निपटने के लिए पुराना और सख्त तरीका अपनाया जाता है।
सच्चाई बनाम नैरेटिव
देश के युवाओं का गुस्सा और नीट पेपर लीक को लेकर शिक्षा मंत्री से जवाबदेही मांगना पूरी तरह जायज है, क्योंकि छात्रों का भविष्य और उनका मानसिक स्वास्थ्य दांव पर लगा है।
लेकिन इसके साथ ही आंदोलन के पीछे के राजनीतिक इरादों, पुराने संपर्कों और फंडिंग की पारदर्शिता पर सवाल उठना भी उतना ही स्वाभाविक है। इतिहास गवाह है कि कई बार वास्तविक जन-आंदोलन आगे चलकर पूरी तरह राजनीतिक रूप ले लेते हैं, जैसा कि अन्ना आंदोलन के बाद ‘आप’ के गठन के समय देखा गया था।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस पूरे विरोध प्रदर्शन से देश की परीक्षा प्रणाली में कोई ठोस और जमीनी सुधार आएगा या फिर यह भी भारत की अंतहीन राजनीति का एक और हिस्सा बनकर रह जाएगा? युवाओं को केवल राजनीतिक नफा-नुकसान नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष जांच और पारदर्शी व्यवस्था की जरूरत है।
सवाल सिर्फ राजनीति का नहीं, सुधार का भी
युवाओं का गुस्सा और निष्पक्ष जांच की मांग पूरी तरह जायज है। लेकिन आंदोलन के पीछे राजनीतिक संपर्कों और फंडिंग की पारदर्शिता पर उठ रहे सवाल भी महत्वपूर्ण हैं। सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि क्या इससे परीक्षा प्रणाली में वास्तविक सुधार होगा या मामला केवल राजनीतिक विमर्श तक सीमित रह जाएगा।
