एम एम एस
लो जी! दिल्ली की अदालत ने पतियों को एक ऐसा करारा ‘रियालिटी चेक’ दिया है, जिसे सुनकर निकम्मेपन का बहाना ढूंढनेवाले पतियों के पसीने छूट जाएंगे। सीधा और साफ संदेश है, ‘मियां जी, कमाओ या न कमाओ, जेब ढीली करनी ही पड़ेगी!’
अदालत ने साफ कर दिया है कि शादी का लड्डू खाया है तो उसका बिल भी चुकाना पड़ेगा। आप यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकते कि ‘मैं तो बेरोजगार हूं, मेरे पास पैसे कहां!’
पूरा मामला क्या है? (जरा गौर फरमाएं)
मामला घरेलू हिंसा से जुड़ा है। एक मोहतरमा की शादी फरवरी २०१३ में हुई थी। शादी के बाद ससुराल वालों ने ‘दहेज’ नाम का पुराना राग अलापना शुरू कर दिया। हद तो तब हो गई जब प्रेग्नेंसी के दौरान ही उन्हें घर से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। मामला जब अदालत पहुंचा तो पति देव ने अपना सबसे पसंदीदा रोना रोया, ‘मैं तो बेरोजगार हूं, खुद पाई-पाई को मोहताज हूं, पत्नी और बच्चे को कहां से खिलाऊं?’
अदालत का ‘नो-एक्सक्यूज’ फैसला
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शीतल चौधरी प्रधान ने पति के इस बहाने को हवा में उड़ाते हुए कहा:
खर्च संभालना आपकी सिरदर्दी है: आप बेरोजगार हैं या आपके सिर पर दुनियाभर की जिम्मेदारियां हैं, इससे कानून को कोई फर्क नहीं पड़ता।
आप अपनी कानूनी रूप से ब्याही पत्नी और मासूम बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बैकआउट नहीं कर सकते। अदालत ने निचली अदालत का पैâसला पलटते हुए पति देव को आदेश दिया कि चुपचाप अपने बेटे के लिए ६,००० रुपए महीना बांध लें।
पते की बात, इस फैसले ने साफ कर दिया है कि शादी के बाद ‘बेरोजगारी’ कोई ढाल नहीं है। अगर आप शादीशुदा हैं तो कोर्ट की नजर में आप ‘सुपरमैन’ हैं, पैसे कहां से आएंगे, यह जादू आपको खुद ही करना पड़ेगा!
