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महामृत्युंजय जप-विधि

शीतल अवस्थी

विद्वानों के अनुसार, महामृत्युंजय मंत्र का जप और उपासना साधक अपनी आवश्यकता के अनुरूप करे, तो यह विशेष लाभप्रद मानी जाती है। आवश्यकता के अनुसार जप के लिए अलग-अलग मंत्रों का प्रयोग किया जाता है। मंत्रों के अक्षरों की संख्या के आधार पर इनका भेद किया गया है।
महामृत्युंजय मंत्र के विभिन्न रूप
एकाक्षरी मंत्र
‘हौं’
त्र्यक्षरी मंत्र
‘ॐ जूं सः’
चतुराक्षरी मंत्र
‘ॐ वं जूं सः’
नवाक्षरी मंत्र
‘ॐ जूं सः पालय पालय’
दशाक्षरी मंत्र
‘ॐ जूं सः मां पालय पालय’
दशाक्षरी मंत्र का जप यदि साधक स्वयं के लिए कर रहा हो, तो उपर्युक्त मंत्र में ‘मां’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। यदि यह जप किसी अन्य व्यक्ति के कल्याण, स्वास्थ्य या रक्षा के लिए किया जा रहा हो, तो ‘मां’ के स्थान पर उस व्यक्ति का नाम लेना चाहिए।
वेदोक्त महामृत्युंजय मंत्र
महामृत्युंजय का वेदोक्त मंत्र इस प्रकार है,
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
इस महामृत्युंजय मंत्र में मूल रूप से 32 अक्षर माने जाते हैं। मंत्र के आरंभ में ‘ॐ’ लगाने से यह 33 अक्षरों का हो जाता है। इसलिए इसे त्रयस्त्रिंशाक्षरी अर्थात् तैंतीस अक्षरों वाला मंत्र भी कहा जाता है।
श्री वशिष्ठजी ने इन 33 अक्षरों के 33 देवता अथवा शक्तियां मानी हैं। महामृत्युंजय मंत्र में 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य, 1 प्रजापति और 1 वषट् का भाव माना गया है।
मंत्र-विचार
महामृत्युंजय मंत्र के प्रत्येक शब्द का स्पष्ट उच्चारण और भावपूर्वक चिंतन अत्यंत आवश्यक माना गया है, क्योंकि शब्द से ही मंत्र की रचना होती है और मंत्र से ही शक्ति प्रकट होती है। इस मंत्र में प्रयुक्त प्रत्येक शब्द अपने भीतर एक गहन और संपूर्ण अर्थ समेटे हुए है। इन्हीं शब्दों के माध्यम से देवशक्तियों का बोध होता है।
महामृत्युंजय मंत्र के अलग-अलग रूपों का उल्लेख विभिन्न परंपराओं में मिलता है। साधक अपनी आवश्यकता, श्रद्धा और सुविधा के अनुसार किसी भी मंत्र का चयन कर सकता है। इसका नित्य पाठ किया जा सकता है अथवा विशेष आवश्यकता के समय नियमानुसार जप किया जा सकता है।
तांत्रिक बीजोक्त महामृत्युंजय मंत्र
ॐ भूः भुवः स्वः।
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।
स्वः भुवः भूः ॐ॥
संजीवनी महामृत्युंजय मंत्र
ॐ ह्रौं जूं सः।
ॐ भूर्भुवः स्वः।
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।
स्वः भुवः भूः ॐ।
सः जूं ह्रौं ॐ॥
ध्यान रखने योग्य बातें
महामृत्युंजय मंत्र का जप श्रद्धा, शुद्ध उच्चारण और एकाग्र मन से करना चाहिए। जप से पहले स्नान, स्वच्छ वस्त्र, शांत स्थान और भगवान शिव का ध्यान श्रेष्ठ माना गया है। साधक को मंत्र-जप के समय जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। प्रत्येक शब्द का उच्चारण स्पष्ट और भावपूर्ण होना चाहिए।
यह मंत्र भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने, भय, रोग, संकट और अकाल मृत्यु के निवारण के लिए अत्यंत प्रभावकारी माना गया है। श्रद्धा, नियम और विश्वास के साथ किया गया महामृत्युंजय जप साधक के जीवन में मानसिक शांति, आत्मबल और आध्यात्मिक संरक्षण प्रदान करता है।

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