मुंबई के सियासी गलियारों में चर्चा है कि अजीत पवार गुट अब केवल पारंपरिक मराठा-नेतृत्ववाली राजनीति पर निर्भर नहीं रहना चाहता। पार्थ पवार, सुनेत्रा पवार और प्रशांत किशोर की मुलाकात के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या एनसीपी अपने पुराने समीकरणों से आगे जाकर ‘डेटा, माइक्रो मैनेजमेंट और इमेज बिल्डिंग’ की राजनीति अपनाने वाली है। पार्थ पवार ने भले ही कहा हो कि प्रशांत किशोर की कोई औपचारिक भूमिका तय नहीं हुई है, लेकिन गॉसिप यही है कि पार्टी में रणनीति की नई खिड़की खुल चुकी है।
मनपा में शिंदे गुट साइड लाइन
मनपा चुनाव में भाजपा के सत्ता हथियाने और सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरकर महायुति में बढ़त बनाने से शिंदे गुट परेशान है। मेयर चुनाव के समय से भाजपा शिंदे में सत्ता साझेदारी को लेकर खूब अटकलें चली थीं। लेकिन अब चर्चा यह है कि मुंबई महानगरपालिका में भाजपा अब सहयोगी गुटों के सहारे नहीं, बल्कि अपने स्वतंत्र नगर-नेतृत्व की छवि बनाना चाहती है। शिंदे गुट के लिए यह आसान स्थिति नहीं है, क्योंकि मुंबई के असंतुष्टों को संतुष्ट करना गुट की सबसे बड़ी चुनौती है और भाजपा है कि उन्हें घास भी नहीं डालना चाहती।
जरांगे की भूख हड़ताल से सरकार को सिरदर्द
मनोज जरांगे ने ३० मई से मराठा आरक्षण की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल का एलान किया है। चर्चा यह है कि सरकार के भीतर इस मुद्दे को लेकर बेचैनी है, क्योंकि मराठा आरक्षण केवल सामाजिक मांग नहीं, बल्कि सीधे-सीधे चुनावी भूगोल बदलने वाला मुद्दा है। मुंबई में बैठे सत्ता रणनीतिकारों को डर है कि अगर आंदोलन फिर तेज हुआ तो ग्रामीण महाराष्ट्र की गर्मी मंत्रालय तक महसूस होगी।
श्रेय की लड़ाई सबसे बड़ा लफड़ा
मुंबई में सड़क बने तो श्रेय किसका? मनपा का, राज्य सरकार का, मुख्यमंत्री का, शिवसेना का या स्थानीय विधायक का? यही अब चर्चा का विषय है। महायुति की असली चुनौती और कोई नहीं, बल्कि अपना ही प्रचार-प्रबंधन है। हर नेता चाहता है कि काम उसके नाम से दिखे और यही छोटी-छोटी प्रतिस्पर्धा आगे चलकर बड़ी राजनीतिक खींचतान में बदल सकती है।
