मुख्यपृष्ठस्तंभबांग्लादेश की सरकार से सवाल कानून चलेगा या भीड़?

बांग्लादेश की सरकार से सवाल कानून चलेगा या भीड़?

-२०२६ की शुरुआत में प्रकाशित रिपोर्टों में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हत्या, महिलाओं के प्रति हिंसा और पूजा स्थलों पर हमलों के मामले दर्ज होने की बात सामने आई।

बांग्लादेश में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली नई बीएनपी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब केवल शासन चलाने की नहीं, बल्कि राज्य की सत्ता को सड़कों पर सक्रिय हिंसक भीड़ से वापस लेने की है। ढाका में दो वर्ष की मासूम बच्ची के साथ कथित दरिंदगी और हत्या की घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया है। पूर्व रॉ अधिकारी लकी बिष्ट ने इसे जमात समर्थकों से जोड़ते हुए मौजूदा शासन की प्रशासनिक कमजोरी बताया है। ऐसे गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है, लेकिन घटना अपने आप में कानून-व्यवस्था की भयावह गिरावट का संकेत देती है।
बांग्लादेश में भीड़ हिंसा कोई एकाकी घटना नहीं रही। ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी २०२६ रिपोर्ट में लिखा कि अंतरिम दौर के बाद देश में राजनीतिक दलों और गैर-राज्य समूहों की ओर से भीड़ हिंसा में चिंताजनक वृद्धि हुई; स्थानीय मानवाधिकार संगठन ऐन ओ सालिश केंद्र के हवाले से जून से अगस्त २०२५ के बीच कम-से-कम १२४ लोगों की भीड़ के हमलों में मौत दर्ज की गई। एक रिपोर्ट में भी चुनावी माहौल के दौरान बीएनपी और जमात कार्यकर्ताओं के बीच डर, धमकी और हिंसक झड़पों का उल्लेख किया गया था।
अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हमले भी चिंता बढ़ाते हैं। २०२६ की शुरुआत में प्रकाशित रिपोर्टों में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हत्या, महिलाओं पर हिंसा और पूजा स्थलों पर हमलों के मामले दर्ज होने की बात सामने आई। ढाका में प्रतिबंधित इस्लामी समूह हिज्ब उत-तहरीर की रैली को हटाने के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों में टकराव भी बताता है कि कट्टरपंथी समूह सड़क की ताकत दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। यह स्थिति केवल अपराध का प्रश्न नहीं, बल्कि शासन की वैधता की परीक्षा है। यदि नई सरकार अपराधियों को राजनीतिक पहचान के आधार पर संरक्षण देती दिखी, तो लोकतंत्र जल्दी ही भीड़तंत्र में बदल सकता है। बांग्लादेश के लिए सबसे जरूरी है, निष्पक्ष जांच, त्वरित न्याय और हर हिंसक समूह पर समान कठोर कार्रवाई।

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