अनिल तिवारी
-मोदी-शाह के चुनावी प्रबंधन पर निर्भर होगा २०२७ का चुनाव
-क्या तीसरी बार सत्ता में वापसी कर पाएंगे योगी?
२०२७ का असली सवाल यह नहीं है कि योगी लोकप्रिय हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि योगी के साथ मोदी-शाह कितने मन से खड़े होंगे। यदि पूरी केंद्रीय मशीनरी उनके पक्ष में उतरी, तो भाजपा फिर मजबूत दावेदार रहेगी। लेकिन यदि केंद्र और प्रदेश नेतृत्व के बीच ठंडापन दिखा, तो तीसरी बार सत्ता में लौटना योगी के लिए आसान नहीं होगा।
-ऊपर से भाजपा मजबूत दिखती है, लेकिन भीतर ब्राह्मण असंतोष, गैर-यादव ओबीसी की अपेक्षाएं, दलित मतदाताओं की दूरी, स्थानीय विधायकों के प्रति नाराजगी, महंगाई, बेरोजगारी, पेपर लीक, आवारा पशु और प्रशासनिक कठोरता जैसे मुद्दे चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं।
उत्तर प्रदेश में २०२७ का विधानसभा चुनाव केवल योगी आदित्यनाथ बनाम अखिलेश यादव या भाजपा बनाम सपा का सामान्य मुकाबला नहीं होगा। यह चुनाव भाजपा के भीतर शक्ति-संतुलन, केंद्रीय नेतृत्व की प्राथमिकता, प्रदेश संगठन की एकजुटता और जातीय समीकरणों की भी बड़ी परीक्षा बनेगा। ‘एक्सिस माय इंडिया’ के चेयरमैन प्रदीप गुप्ता का यह कहना कि फिलहाल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने कोई बड़ी समस्या दिखाई नहीं देती, भाजपा के लिए राहत देने वाला आकलन जरूर है, लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में आज की संतुष्टि कल की नाराजगी में बदलते देर नहीं लगती।
२०२२ के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने ४०३ में से २५५ सीटें जीतकर सत्ता बरकरार रखी थी और सहयोगियों के साथ एनडीए का आंकड़ा २७३ तक पहुंचा था। उस जीत को योगी सरकार की कानून-व्यवस्था, हिंदुत्व, लाभार्थी योजनाओं और मोदी-शाह की चुनावी मशीनरी की संयुक्त सफलता माना गया था। लेकिन २०२७ का चुनाव २०२२ की पुनरावृत्ति होगा, यह मान लेना राजनीतिक भूल होगी।
२०२४ के लोकसभा चुनाव ने भाजपा को उत्तर प्रदेश में बड़ा झटका दिया। जिस प्रदेश से पार्टी को सबसे अधिक उम्मीद थी, वहीं उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली। यह परिणाम संकेत देता है कि भाजपा का वोट बैंक अजेय नहीं है और जातीय समीकरण, स्थानीय असंतोष तथा विपक्षी एकजुटता मिलकर सत्ता की मजबूत दीवार में भी दरार डाल सकते हैं। यहीं से योगी आदित्यनाथ की असली चुनौती शुरू होती है। ऊपर से भाजपा मजबूत दिखती है, लेकिन भीतर ब्राह्मण असंतोष, गैर-यादव ओबीसी की अपेक्षाएं, दलित मतदाताओं की दूरी, स्थानीय विधायकों के प्रति नाराजगी, महंगाई, बेरोजगारी, पेपर लीक, आवारा पशु और प्रशासनिक कठोरता जैसे मुद्दे चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाता लंबे समय से भाजपा का महत्वपूर्ण आधार रहे हैं। यदि इस वर्ग में उपेक्षा या ठाकुरवादी वर्चस्व की धारणा मजबूत होती है, तो भाजपा को कई सीटों पर नुकसान हो सकता है।
सबसे बड़ा प्रश्न मोदी-शाह फैक्टर का है। भाजपा की चुनावी सफलता का सबसे बड़ा सूत्र अब तक केंद्रीय नेतृत्व का आक्रामक चुनावी प्रबंधन रहा है। पश्चिम बंगाल में भाजपा ने पूरी केंद्रीय शक्ति झोंक दी थी। हरियाणा और अन्य राज्यों में भी स्थानीय असंतोष के बावजूद केंद्रीय रणनीति, बूथ प्रबंधन, प्रत्याशी चयन और सामाजिक समीकरणों के जरिए पार्टी ने मुकाबला खड़ा किया। ऐसे में सवाल स्वाभाविक है कि क्या २०२७ में योगी के लिए भी मोदी-शाह उसी तीव्रता, उसी मनोयोग और उसी संसाधन के साथ उतरेंगे? यही संशय योगी के लिए सबसे गंभीर है। यदि केंद्रीय नेतृत्व को लगे कि योगी का कद बहुत अधिक स्वतंत्र हो रहा है या प्रदेश संगठन कई खेमों में बंट चुका है, तो चुनावी ऊर्जा सीमित हो सकती है। भाजपा में सार्वजनिक मतभेद कम दिखते हैं, लेकिन टिकट वितरण, जातीय संतुलन और नेतृत्व की खींचतान भीतर ही भीतर असर डाल सकते हैं।
