सामना संवाददाता / मुंबई
२,५०० करोड़ की परियोजना पर मंजूरियों का ग्रहण
मैंग्रोव्ज और जमीन विवाद बना बड़ी बाधा
‘१० मिनट का सपना’ अभी भी अधूरा
लाखों लोग रोज झेल रहे ट्रैफिक का दर्द
मुंबई महानगर क्षेत्र की सबसे चर्चित और बहुप्रतीक्षित वसई-भायंदर डबल डेकर ब्रिज परियोजना एक बार फिर घोषणाओं और फाइलों में उलझती नजर आ रही है। करीब २५ साल पहले सामने आई इस महत्वाकांक्षी योजना पर आज तक निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका है। अब एक बार फिर एमएमआरडीए ने नया प्रस्ताव तैयार कर सरकार को भेजा है, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी अनिश्चितताओं से घिरी हुई है।
करीब २,५०० करोड़ रुपए की इस परियोजना को ट्रैफिक जाम खत्म करने और वसई-भायंदर के बीच सफर को ९० मिनट से घटाकर १० मिनट करने वाला ‘गेम चेंजर’ बताया जा रहा है। लेकिन प्रशासनिक मंजूरियां, जमीन अधिग्रहण और पर्यावरणीय अड़चनें इस परियोजना की सबसे बड़ी रुकावट बनी हुई हैं।
सूत्रों के मुताबिक, इस डबल डेकर पुल के लिए मैंग्रोव्ज क्षेत्र और नमक उत्पादन वाली जमीन का अधिग्रहण करना होगा। यही वजह है कि वर्षों से यह योजना कानूनी और प्रशासनिक विवादों में फंसी हुई है। अब तक पांच में से केवल तीन सरकारी एजेंसियों से ही मंजूरी मिल सकी है, जबकि वन विभाग और केंद्र सरकार के नमक आयुक्त कार्यालय से अनुमति अब भी लंबित है।
परियोजना को लेकर स्थानीय स्तर पर भी चिंता बढ़ रही है। नमक पैन क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों का कहना है कि उन्हें अब तक स्पष्ट मुआवजा नीति नहीं बताई गई है। साल २०१३ में कई परिवारों ने जमीन पर मालिकाना हक को लेकर मुंबई हाई कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया था, लेकिन विवाद अब तक पूरी तरह सुलझ नहीं पाया है।
नई योजना के अनुसार, वसई खाड़ी पर बहुस्तरीय पुल बनाया जाएगा, जिसमें नीचे सड़क मार्ग, बीच में मेट्रो लाइन-१३ और सबसे ऊपर छह लेन का फ्लाईओवर होगा। हालांकि, परियोजना की लगातार बढ़ती लागत और वर्षों की देरी ने इसकी व्यावहारिकता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
लाखों यात्रियों के लिए राहत का सपना दिखाने वाली यह परियोजना फिलहाल फिर एक बार सरकारी प्रक्रियाओं, पर्यावरणीय मंजूरियों और जमीन विवादों के जाल में फंसी दिखाई दे रही है।
