राजन पारकर
किसी देश की असली पहचान उसके भाषणों से नहीं, बल्कि उसकी सड़कों, उसके भोजन और उसके बच्चों की सुरक्षा से होती है। एक ओर अधूरी सड़क और दिशाहीन व्यवस्था एक श्रद्धालु महिला की जान ले लेती है। दूसरी ओर दूध में मिलावट करने वाले समाज की सेहत बेच रहे हैं। तीसरी ओर बच्चों को ऊर्जा के नाम पर बेची जा रही आदतों पर सरकार को प्रतिबंध लगाना पड़ता है। तीनों घटनाएं अलग-अलग हैं, लेकिन आईना एक ही दिखाती है। जब व्यवस्था समय पर जागती नहीं, तब जनता कीमत अपनी जान, अपने स्वास्थ्य और अपने भविष्य से चुकाती है।
दूध में पानी नहीं, लालच की मिलावट!
जिस देश में दूध को अमृत कहा गया, वहां कुछ लोगों ने उसे मुनाफे की प्रयोगशाला बना दिया। बच्चे ताकत पी रहे हैं या जहर, यह तय करना अब प्रयोगशालाओं का काम हो गया है। यदि मिलावट करने वाले यह समझते हैं कि जनता की सेहत बेचकर वे अपनी तिजोरी भर लेंगे, तो अब लगता है कि कानून उनकी दुकान का हिसाब मांगने निकल पड़ा है। अन्न और औषधि प्रशासन की सख्त कार्रवाई का संदेश साफ है कि दूध में मिलावट केवल कानून का अपराध नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के साथ विश्वासघात है। आजकल दूध वाले से ़ज्यादा भरोसा लोग चाय वाले पर करने लगे हैं, क्योंकि कम से कम चाय वाला खुलकर कहता है कि इसमें पानी है! यदि कार्रवाई लगातार और निष्पक्ष रही, तो यह केवल मिलावटखोरों पर नहीं, बल्कि वर्षों से पल रहे भ्रष्ट संरक्षण पर भी चोट होगी।
बच्चों के हाथ में किताब हो या कैफीन का कैन?
स्कूल के बाहर कभी इमली, चना और किताबें बिकती थीं। अब रंग-बिरंगे डिब्बों में ‘ताकत’ और ‘एनर्जी’ बिकती है। बच्चे खेल के मैदान में पहुंचने से पहले ही कैफीन की आदत सीख रहे हैं। यदि सरकार ने स्कूलों के आसपास ऐसे पेयों की बिक्री रोकने का निर्णय लिया है, तो यह केवल व्यापार पर रोक नहीं, बल्कि बचपन की रक्षा का प्रयास माना जाएगा, लेकिन एक सवाल अभी भी जिंदा है। क्या केवल पांच सौ मीटर की सीमा तय कर देने से बच्चों की आदतें बदल जाएंगी? विज्ञापनों का क्या होगा? चमकदार प्रचार का क्या होगा? बाजार तो बच्चों के मन में अपनी दुकान पहले ही खोल चुका है। पहले गुरु बच्चों को जागृत करते थे, अब बाजार उन्हें ‘एनर्जी’ पिलाकर जगाए रखना चाहता है। सरकार यदि सचमुच बच्चों के स्वास्थ्य की चिंता करती है, तो कार्रवाई केवल दुकानदारों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। बच्चों को उपभोक्ता बनाने वाली मानसिकता पर भी लगाम लगानी होगी। वरना स्कूलों के बाहर बोर्ड बदलेंगे, लेकिन बाजार का इरादा नहीं।
‘गूगल ने रास्ता दिखाया या व्यवस्था ने मौत बिछाई?’
आजकल लोग कहते हैं-‘गूगल सब जानता है’ लेकिन सवाल यह है कि क्या गूगल से भी ज्यादा सोई हुई हमारी व्यवस्था कुछ जानती है। एक मां अपने बेटे के साथ भगवान गणपति के दर्शन करके लौट रही थी। आस्था से भरी यात्रा घर पहुंचने से पहले शोकसभा में बदल गई। चर्चा है कि जीपीएस ने अधूरे मार्ग की ओर मार्गदर्शन किया, लेकिन असली अपराधी केवल तकनीक नहीं हो सकती। यदि सड़क अधूरी थी, तो उसे खुला जैसा क्यों दिखने दिया गया? चेतावनी बोर्ड कहां थे? बैरिकेड कहां थे? रोशनी कहाँ थी? हमारे यहां सड़क पूरी होने से पहले उद्घाटन की तैयारी हो जाती है, लेकिन सुरक्षा की तैयारी कभी पूरी नहीं होती।
