मुख्यपृष्ठस्तंभसंडे स्तंभ: सौ रुपए में बन जाता था मुंबई में मकान

संडे स्तंभ: सौ रुपए में बन जाता था मुंबई में मकान

-एक रुपये के नोट या सिक्के को कम मत आंकिए। डिजिटल पेमेंट और यूपीआई के इस युग में भी इसके नाज-नखरे कायम हैं। सबसे प्रचलन वाला सिक्का एक रुपया ही है।

एक रुपया में साधारण कैंडी भी नहीं आती, न ही कोई याचक अब इसे भीख तक के रूप में कबूलता है। यह इस्तेमाल में आता है, तो बस शगुन के लिफाफे में, जिसे आप १०, २०, ५०, १००, २०० या ५०० के नोटों की संगत में उसकी मंगलकारिता बढ़ाने के लिए रख देते हैं या कभी-कभी क्रिकेट के टॉस में। भाड़ा अगर एक रुपया ज्यादा हो तो रिक्शेवाला भी उदारता दिखाते हुए आपको हाथ जोड़ देता है, आप तो खैर इस ‘चेंज’ की उससे अपेक्षा करते ही नहीं।
अगर इतना पढ़कर आप सोच रहे हैं कि एक रुपया का भाव गिर गया है तो गलतफहमी सुधार लीजिए। रुपए के रुतबे की मिसाल है भारतीय रिजर्व बैंक की ताजातरीन रिपोर्ट, जिसके मुताबिक डिजिटल पेमेंट और यूपीआई के इस युग में भी, पिछले एक दशक से अधिक समय से एक रुपया ही सबसे प्रचलन वाला सिक्का बना हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च, २०२६ तक देश में एक रुपया के करीब ५,४९९ करोड़ सिक्के चलन में थे, जो प्रचलन में मौजूद ५० पैसे, दो रुपए, पांच रुपए, १० रुपए और २० रुपए सहित सभी सिक्कों को भी मिलाकर उसका ३८.४ फीसदी है। वित्त वर्ष २०१४, २०१५ और २०१६ के अंत में तो इसकी हिस्सेदारी करीब ४२ फीसदी थी। २०१६ में एक रुपया के लगभग ४,५०० करोड़ सिक्के चलन में थे।
अतीत में एक रुपया की कीमत मुंबई में क्या थी? यह पूछने पर गूगल बाबा ने कई दिलचस्प उत्तर दिए:
-आज अमूमन २०-२५ रुपए की कीमत में मिलने वाला वड़ा-पाव शुरू में महज १० पैसे में मिलता था। ५० वर्ष पहले इसकी कीमत हुआ करती थी २५ पैसे।
-ईरानी रेस्त्रां में ग्राहक की पोशाक देखकर वेटर पुकार लगाता, ‘जूनियर का रुपिया’, ‘धोतीदास का चवन्नी’, ‘टोपी वाले का आठ आना’ …। महज पानी पीकर संतोष करना लेने वाले के लिए चुप्पा सा संबोधन होता ‘फोकटिया’। इससे आप वहां उस समय के बिल का अंदाज लगा सकते हैं।
-१९६० दशक की शुरुआत में मुंबई के उडुपी होटलों में एक रुपया में वेज थाली मिल जाती थीं। एक रुपया में लगभग छह से आठ समोसे या पूरियां खरीद सकते थे। एक रुपया में एक किलो चावल आ जाता था।
-१९७० के दशक में मुंबई की बेस्ट की बसों में एक रुपया में आप नौ किलोमीटर तक की दूरी तय कर सकते थे।
-१९५० – ६० के दशक में मुंबई के सिनेमाघरों में सबसे आगे वाली क्लास (स्टाल्स) का एक फिल्म टिकट ५० पैसे से लेकर एक रुपया के बीच मिल जाता था।
-१९५० के दशक में छोटे घरों का महीने भर का बिजली बिल कभी-कभी एक रुपया से भी कम आता था।
-पुराने समय में कई फैमिली डॉक्टर एक रुपया की फीस में मरीज को देखने के साथ-साथ खुद के पास से दवाइयां भी दे देते थे।
इससे भी पहली की बात। १८६२ में मुंबई के गवर्नर बनने वाले सर हेनरी बार्टल एडवर्ड ‌‌‌फ्रेयर की बेटी मेरी फ्रेयर ने १८६८ में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘ओल्ड डेकन डेज’ में अपनी आया ऐना लिबरेरा से सुने वर्णनों के आधार पर उस समय मौजूद मुंबई की कीमतों की चर्चा की है। ऐना अपने बचपन के दिनों की चर्चा करते हुए शिकायत करती है, ‘उस वक्त (१८१५ के लगभग) घर का किराया आधा रुपए से ज्यादा नहीं था। १०० रुपए में तो अच्छा-खासा बड़ा मकान बनाया जा सकता था। आज (१८६८ में) घर खर्च ३० रुपए महीना तक हो गया है, जबकि उस वक्त छह-सात रुपए था। आज एक रुपया में पौंड-भर धान मिलता है, जो उस वक्त दो आने में मिलता था। छह पैसे में एक बोतल भरकर तेल मिलता था, जबकि आज चार आने लगते हैं। चार आने की नमक, मिर्च, प्याज आदि ले आओ, तो पूरा परिवार मिलकर महीने भर खाता था। एक पैसे में भर पेट पूरी-सब्जी और पौंड भर मटन मिल जाता था। आधा रुपया में जलाने की लकड़ी से घर भर जाता था। पानी का आज आधा रुपया अधिक लगता है, जबकि उस वक्त एक पैसा में भिश्ती सुबह-शाम महीने भर घर पर पानी पहुंचा जाता था। बच्चों की जिद पर उन्हें एक पैसा देने पर वे जितने अमरूद चाहते मिल जाते थे, पर आज एक अमरूद के लिए उतना ही यानी एक पैसा देना पड़ता है।’
ताजमहल होटल का किराया था छह रुपये
५६० कमरों वाले ताजमहल होटल के कुछ सुइट्स का किराया लाखों में और शानदार डिश का मूल्य हजारों में सुनकर आप आज गश खा जाते हों तो जान लीजिए १६ दिसंबर, १९०२ को जब यह खुला तो उसका शुरुआती किराया था मात्र छह रुपए और कुछ समय बाद १० रुपये। सिंगल रूम, पंखे और अटैच्ड बॉथरूम की सुविधा वाले के लिए १३ रुपए और भोजन की सुविधा के साथ २० रुपए। होटल के पहले १७ ग्राहकों में से कुछ को इतना भी ज्यादा लगा था। अपोलो बंदर के ग्रीन रेस्तरां को टाटा की इंडियन होटल कंपनी ने १९०४ में खरीद लिया तो उसकी पब्लिसिटी अखबारों में कुछ इस तरह हुई- ‘ब्रेकफास्ट, टिफिन, डिनर और सपर-एक रुपया में।’
इंग्लैंड में छपा था पहला नोट
एक रुपया का नोट ३० नवंबर, १९१७ को बाईं ओर इंग्लैंड के सम्राट जॉर्ज पंचम की छवि के साथ प्रामिसरी नोट के रूप में इंग्लैंड में जारी हुआ था। उस समय इसकी कीमत १०.७ ग्राम चांदी के बराबर थी, जितना चांदी के एक सिक्के का वजन होता था। औसत मजदूरी उन दिनों एवâ से चार रुपए होती थी। प्रथम विश्वयुद्ध में चांदी महंगी हो जाने से लोग सिक्का गलाकर बार और ईंटों के रूप में बेचकर मुनाफा कमाने लगे, तब नोट के रूप में इसका विस्तृत चलन शुरू हुआ। अभी तक इसकी डिजाइन में २८ से अधिक परिवर्तन हो चुके हैं। संग्राहक १९१७ के जमाने की मुद्रा १५,००० – २०,००० रुपए तक में खरीद लेते हैं। दरअसल, इसका एक नोट छापने की लागत इसकी ‘फेस वैल्यू’ से ज्यादा है।
कायम है दबदबा
बैकर्स का कहना है कि एक रुपए के सिक्के बहुत कम चलन से बाहर किए जाते हैं, इसलिए संख्या के लिहाज से इनका दबदबा बना हुआ है। हालांकि, कुल मूल्य के हिसाब से पांच और १० रुपए के सिक्कों की हिस्सेदारी अब ज्यादा हो गई है। एक रुपया का सिक्का आज भी खूब इस्तेमाल होता है मंदिरों में चढ़ावे, छोटे लेन-देन, किराना स्टोर, बस यात्रा, रिक्शे के भुगतान और फुटपाथी खरीद और यात्रा के दौरान। खासकर, ग्रामीण इलाकों और छोटे कस्बों में। और एक रुपया का नोट सबसे अधिक ११, २१, ५१, १०१ रुपए जैसे का नेग व्यवहार में। शादी में नोटों की माला पहनाने और दिवाली और लक्ष्मी पूजा जैसे त्योहारों के समय इसका एक बंडल पंद्रह गुनी कीमत पर भी बिक जाता है। एक रुपया की उपयोगिता का सबसे बड़ा कारण यह है कि छोटे लेन-देनों में अंतिम रुपये का निबटारा करने में यही सक्षम है।

अन्य समाचार