राजन पारकर
दुनिया की राजनीति भी अजीब रंग दिखाती है। कहीं एक देश अपनी अर्थव्यवस्था बचाने के लिए कर्ज की कतार में खड़ा है, तो कहीं दोस्ती और रणनीति के बीच रिश्तों की असली परीक्षा हो रही है। दूसरी तरफ, एक अभिनेता बारिश और ट्रैफिक के बीच अपनी शाही गाड़ी छोड़कर आम आदमी की तरह मेट्रो में सफर करता है। इन तीनों खबरों में एक ही सवाल छिपा है कि सत्ता, संपत्ति और संबंधों के पीछे असली चेहरा कौन-सा है। ‘दुनिया के मंच पर हर कोई अपना किरदार निभा रहा है। कोई मदद मांगने वाला है, कोई दोस्ती निभानेवाला तो कोई इंसानियत दिखाने वाला। फर्क सिर्फ इतना है कि कुछ चेहरे कैमरे के सामने आते हैं और कुछ इतिहास के पन्नों में छिप जाते हैं।’
दोस्त बदलते रहे, हिसाब नहीं बदला
पाकिस्तान की हालत उस पुराने दुकानदार जैसी हो गई है, जिसकी दुकान पर ताला नहीं लगा, मगर उधारी की डायरी इतनी मोटी हो गई कि ग्राहक से ज्यादा साहूकार दिखाई देने लगे। कभी अमेरिका की तरफ उम्मीद भरी निगाहें, कभी चीन की तरफ दोस्ती का हाथ, लेकिन सवाल वही है कि आखिर यह हाथ मदद के लिए उठ रहा है या मजबूरी के लिए। चीन ने अरबों डॉलर की आर्थिक मदद दी, कर्ज बढ़ाया और पुराने कर्ज को आगे बढ़ाया। मगर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में कोई भी देश अपनी जेब सिर्फ दोस्ती में खाली नहीं करता। हर मदद के पीछे अपना फायदा, अपनी रणनीति और अपना हिसाब होता है। कर्ज लेने वाला राष्ट्र जब हर दरवाजे पर दस्तक देता है, तो उसे दोस्त कम और हिसाब-किताब रखने वाले ज्यादा मिलते हैं। दुनिया में मुफ्त की चाय भी नहीं मिलती, फिर अरबों डॉलर की मदद वैâसे मुफ्त मिलेगी? पाकिस्तान की असली लड़ाई सिर्फ सीमा पर नहीं, बल्कि अपनी अर्थव्यवस्था के भीतर चल रही है। क्योंकि जिस देश की तिजोरी खाली हो, उसकी आवाज अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अक्सर धीमी पड़ जाती है।
दोस्ती की राजनीति में नया मोड़
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में दोस्ती भी मौसम जैसी होती है—कभी धूप, कभी छांव। कल तक जो साथी था, आज वह किसी और के साथ रणनीतिक तस्वीर में दिखाई दे सकता है। रूस और भारत के रिश्ते दशकों पुराने हैं। लेकिन बदलती दुनिया में हर देश अपने हितों का गणित लगाता है। रूस और चीन की बढ़ती नजदीकी ने कई देशों की भौंहें जरूर उठाई हैं। अगर रिपोर्टों में बताई गई सैन्य प्रशिक्षण जैसी गतिविधियां सच साबित होती हैं, तो यह केवल सैन्य मामला नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन का संकेत है। ‘अंतरराष्ट्रीय दोस्ती में दिल कम और दस्तावेज ज्यादा पढ़े जाते हैं। यहां गले मिलने से पहले नक्शे देखे जाते हैं और मुस्कुराने से पहले फायदे गिने जाते हैं।’ भारत के लिए संदेश साफ है- दोस्ती जरूरी है, लेकिन अपनी रणनीतिक ताकत और आत्मनिर्भरता उससे भी ज्यादा जरूरी है। क्योंकि विदेश नीति में भावनाएं अच्छी लगती हैं, मगर फैसले हमेशा समझदारी से लेने पड़ते हैं।
बारिश में दिखी इंसानियत की झलक
मुंबई की बारिश हर साल बड़े-बड़े दावों की पोल खोल देती है। सड़कें रुक जाती हैं, गाड़ियां थम जाती हैं और वीआईपी से लेकर आम आदमी तक एक ही पानी में खड़े दिखाई देते हैं। ऐसे समय में अभिनेता रणदीप हुड्डा का अपनी महंगी कार छोड़कर मेट्रो से सफर करना छोटी बात नहीं लगती। आजकल कई लोग साधारण दिखने के लिए करोड़ों की तैयारी करते हैं, लेकिन कुछ लोग बिना दिखावे के साधारण काम कर जाते हैं। कुछ लोग कार की कीमत से अपनी पहचान बनाते हैं और कुछ लोग कार छोड़कर अपना कद बढ़ा लेते हैं। मास्क पहनकर आम यात्रियों की तरह सफर करने वाला यह दृश्य याद दिलाता है कि लोकप्रियता केवल पर्दे पर नहीं, बल्कि व्यवहार में भी दिखाई देती है। एक तरफ कर्ज में डूबे राष्ट्र हैं, दूसरी तरफ बदलती दोस्तियों की दुनिया है और तीसरी तरफ एक इंसान है, जो बारिश में अपनी सुविधा छोड़कर जनता के बीच उतर आता है। कहीं सत्ता मजबूर दिखती है, कहीं राजनीति चालाक और कहीं इंसानियत सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आती है। दुनिया के बाजार में हर कोई कुछ बेच रहा है। कोई दोस्ती बेच रहा है, कोई मदद तो कोई अपना अहंकार। मगर आज भी सबसे महंगी चीज सच्चा इंसान होना ही है।
