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महाराष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था बदहाल … हजारों बच्चियों ने छोड़ा स्कूल!

‘महायुति’ की शिक्षा नीति को केंद्र ने किया बेनकाब

सामना संवाददाता / मुंबई
महायुति सरकार की शिक्षा नीति पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं, क्योंकि कम छात्र संख्या वाले स्कूल बंद करने के पैâसले ने सीधे-सीधे राज्य की बच्चियों की शिक्षा पर करारी चोट की है। केंद्र द्वारा जारी ताजा आंकड़ों ने पूरे मामले की सच्चाई उजागर करते हुए बताया है कि पिछले चार वर्षों में कुल १५,३५७ लड़कियां स्कूल छोड़ने पर मजबूर हुई हैं। हर साल बढ़ते इस डरावने ड्रॉपआउट ग्राफ ने न सिर्फ सरकार की नीतियों की पोल खोल दी है, बल्कि यह भी साबित किया है कि स्कूल बंद करने की निर्णय प्रक्रिया ने राज्य की हजारों बच्चियों का भविष्य अंधकार में धकेल दिया है।
राज्यसभा में सरकार से २०२१ से २०२५ तक की अवधि में शिक्षा की धारा से बाहर होने वाले देशभर के बच्चों की जानकारी मांगी गई थी। इसके लिखित उत्तर में केंद्र ने राज्यवार आंकड़े प्रस्तुत किए। इसमें महाराष्ट्र की चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। इस आंकड़े के अनुसार, इस संबंध में २०२१-२०२२ में कुल २३,५२२ बच्चों की पहचान की गई। इनमें से ११,०२२ लड़कियों ने स्कूल छोड़ा। इसके बाद २०२२-२३ में ८,१६५ लड़कियां शिक्षा की धारा से बाहर हो गईं। २०२३-२४ में यही आंकड़ा ३,९३६ रहा। इसके बाद २०२४-२५ में अब तक १५,३५७ लड़कियां शिक्षा से बाहर हो चुकी हैं। यह अस्थाई आंकड़ा है और इसमें और वृद्धि होने की आशंका है। महाराष्ट्र के इन आंकड़ों के साथ-साथ देश के अन्य राज्यों में भी कुछ ऐसी ही स्थिति है।

बंद हो रहे स्कूल
राकांपा विधायक रोहित पवार ने लड़कियों के स्कूल छोड़ने के इन आंकड़ों पर सरकार की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने कहा है कि कम छात्र संख्या वाले स्कूल बंद करने की सरकार की नीति का हमने सदन में और सड़क पर भी लगातार विरोध किया है। सामान्य परिवार के बच्चे शिक्षित होकर सरकार से सवाल पूछेंगे, शायद इस सरकार को यह डर सता रहा होगा। इसीलिए कम छात्र संख्या वाले स्कूल बंद करने की नीति इस सरकार ने अपनाई। उन्होंने कहा कि केवल पंद्रह सौ रुपए देकर सरकार महिलाओं पर एहसान जताती है इसलिए हम इस मुद्दे पर सरकार से जवाब मांगे बिना नहीं रहेंगे।

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