-दो साल में एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का कोरा लक्ष्य
-खानापुर्ति के लिए १४ सदस्यीय टास्क फोर्स का गठन
-शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, मूलभूत संरचना समेत १८ क्षेत्रों का होगा सर्वे
सामना संवाददाता / मुंबई
महायुति सरकार की राज्य को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की महत्वाकांक्षी योजना आलोचनाओं की मार झेल रही है। इसी में सरकार ने १४ सदस्यीय टास्क फोर्स का गठन कर दिया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब योजना को ‘खोखले वादे’ और ‘अमेरिकी सपनों की दुनिया’ बताकर हमले हो रहे हैं। बताया गया है कि टास्क फोर्स सर्वे में शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और मूलभूत संरचना समेत १८ प्रमुख क्षेत्रों को शामिल किया गया है। इनका गहन सर्वेक्षण करके सरकार इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए रोड मैप तैयार करेगी। हालांकि, विपक्ष कह रहा है कि यह योजना केवल मुंगेरीलाल के हसीन सपने है।
बता दें कि केंद्र सरकार ने स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव पर देश को वर्ष २०४७ तक विकसित भारत बनाने का संकल्प लिया है। इस कड़ी में २०२५-२६ तक देश की अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित कर जनता को भ्रमित करने का काम केंद्र सरकार कर रही है। केंद्र सरकार के इसी नक्शेकदम पर महाराष्ट्र सरकार भी चलने लगी है, जिसके तहत राज्य की अर्थव्यवस्था को वर्ष २०२७ तक एक ट्रिलियन डॉलर और वर्ष २०४७ तक ३.५ ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का कभी न पूरा होने वाला लक्ष्य रखा गया है। सूबे के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इसके तहत १५० दिनों का कार्यक्रम घोषित किया है। इसके अनुरूप विकसित महाराष्ट्र २०४७ का विजन डॉक्यूमेंट तैयार करने के संबंध में सभी विभागों को निर्देश दिए गए हैं। इसके तहत उच्च व तकनीकी शिक्षा विभाग के अनुरूप २०४७ का विजन डॉक्यूमेंट तैयार करने के लिए उच्च शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों का टास्क फोर्स स्थापित करने के मामले को कल मंजूरी मिल गई है। इसमें १४ सदस्यों को शामिल किया गया है, जिसे विभिन्न विभागों और विशेषज्ञों के साथ काम करने का निर्देश दिया गया है। योजना में शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्राम और नगर विकास, उद्योग, आधारभूत संरचना समेत १८ क्षेत्रों को शामिल किया गया है।
ट्रिलियन डॉलर सपनों से बहुत पीछे
विकसित महाराष्ट्र २०४७ के विजन डॉक्यूमेंट में प्रगतिशील, शाश्वत, सर्वसमावेशी और सुशासन जैसे चार आधारस्तंभ बताए गए हैं, लेकिन कई विश्लेषक इसे केवल दूर की कौड़ी मान रहे हैं। असलियत में जनता की उम्मीदें और वास्तविक अर्थव्यवस्था के आंकड़े सरकार के ट्रिलियन डॉलर के सपनों से बहुत पीछे हैं। जमीनी हकीकत यह है कि सड़कों पर गड्ढे, स्कूलों में कमी, अस्पतालों में सुविधाओं का अभाव और रोजगार की कमी हर दिन जनता को याद दिलाती है कि यह विकास सिर्फ कागजों की कहानी है।
सफल दिखाने की होड़ में सभी मंत्रालय
सरकारी घोषणाएं चमकदार स्लोगन और प्रेस नोट तक सीमित रह गई हैं। हर मंत्रालय अपनी-अपनी रिपोर्ट में खुद को सफल दिखाने की होड़ में है, लेकिन धरातल पर बदलाव का कोई सबूत नहीं। उद्योग, शिक्षा और स्वास्थ्य के वादे जनता के लिए बस शब्दों का खेल बनकर रह गए हैं।
