सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र में महायुति सरकार का स्वास्थ्य विभाग इन दिनों संक्रमण की मार से बेहाल नजर आ रहा है। मुंबई से लेकर गढ़चिरौली तक मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया ने हाहाकार मचा दिया है। मजाक की हद तो यह है कि जनता के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी उठाने के बजाय सरकार निजी हाथों पर निर्भर हो गई है। गोदरेज और आईसीएमआर के सहारे जन स्वास्थ्य बचाने की कवायद की जा रही है, जबकि राज्य सरकार महज घोषणाओं और दिखावटी दावों तक सीमित रह गई है।
उल्लेखनीय है कि बरसाती बीमारियों के बढ़ते प्रकोप के बीच महायुति सरकार का स्वास्थ्य विभाग खुद को असहाय महसूस कर रहा है। मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया जैसी मच्छर जनित बीमारियों पर नियंत्रण के लिए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को अब टास्क फोर्स गठित करनी पड़ी है। यह पैâसला सरकार की विफल स्वास्थ्य व्यवस्था को उजागर करता है, जो हर साल बरसात आते ही घुटने टेक देती है। निजी क्षेत्र की मदद के बिना सरकार की यह पहल अधूरी है। यही कारण है कि इस टास्क फोर्स को गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के सहयोग से मजबूती दी गई है। सवाल यह है कि जब करोड़ों का बजट हर साल स्वास्थ्य विभाग को मिलता है तो फिर जनता की सुरक्षा के लिए निजी कंपनियों का सहारा क्यों लेना पड़ रहा है।
गढ़चिरौली, नासिक, सातारा और पालघर जैसे जिलों में प्रोजेक्ट के जरिए गोदरेज और स्वास्थ्य विभाग की साझेदारी ने कुछ नतीजे जरूर दिए हैं। मलेरिया और डेंगू की घटनाओं में कमी आई है। इसके तहत अब तक ४०० से अधिक डॉक्टर, १८० लैब अधिकारी और १६५ कीट विशेषज्ञों को प्रशिक्षित किया गया है। हजारों घरों तक पहुंच बनाने और जागरूकता पैâलाने की कवायद चल रही है। इससे डेंगू से होनेवाली मौतों में २७ फीसदी की गिरावट और मलेरिया टेस्टिंग में वृद्धि हुई है, लेकिन यह भी सरकार के सिस्टम की असफलता की कहानी बयां करता है कि राज्य को बीमारी रोकने के लिए कॉर्पोरेट्स पर निर्भर होना पड़ा है।
सरकार सिर्फ घोषणाओं में व्यस्त
महायुति सरकार लगातार बड़े-बड़े बयान और घोषणाओं में व्यस्त है।
बीमारी के आगे नतमस्तक
बरसाती मौसम के आते ही महाराष्ट्र के स्वास्थ्य तंत्र की पोल खुल गई है। रोगों के बढ़ते मामलों के सामने मानो महायुति सरकार पूरी तरह असहाय और नतमस्तक हो रही है। इससे साबित हो रहा है कि करोड़ों की आबादी को सुरक्षा देने के लिए स्वास्थ्य विभाग के पास पर्याप्त तैयारी नहीं है और बुनियादी निगरानी तंत्र और संसाधनों की भारी कमी सामने आ रही है।
