मुख्यपृष्ठस्तंभमैथिली व्यंग्य : अजगर करे न चाकरी...!

मैथिली व्यंग्य : अजगर करे न चाकरी…!

डॉ. ममता शशि झा
मुंबई
गणेश जी सं माता गौरी पृथ्वी लोक के हाल-चाल पूछ लेल गेलि। काल्हि विशेष दिन पर अहि बेर की सब अनुभव भेलनि से पूछबाक लेल।
गणेश जी की कहू माता पृथ्वी पर बहुत बेरोजगारी के समस्या बढ़ि गेलइया, मुदा जे कर्मठ लोक अछि ओकरा लेल काजक कोनो कमी नहीं अछि। किछु अकर्मण्लोय लोक सब ‘एखनो अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम’ बला बात कहि क अपन आलस्य आ काज नहि कर के मानसिकता के बचाव करई छथि। आ ‘देब देब आलसी पुकारा’ बला बात मोन नहि रहई छनि। पंछी भोरे-भोर उठि के अपन दाना के जुटाब में लागि जाय छई से नहिं देखई छथिन। किछु हर सप्ताह ओहि विशेष दिन आबि प्रार्थना करई छथिन हुनका सबके देखि के बड़ अफसोस होईत अछि जे ईश्वर अहांके लेल कार्यक अवसर दई छथि तकरा दिस ध्यान आ ताहि लेल मेहनत नहिं के क हर सप्ताह मूर्त्ति लग आबि के ठाड़ भे जाई छथि, ते हुनकर सबहक अज्ञानता पर बड़ तामश उठि जाईया। एक तरफ ते दुनिया में शारीरिक रूप सं कमजोर लोक सब अपन परिश्रम आ लगन सं अलग-अलग गुण आ क्षमता के अपना भीतर विकास के क परचम लहरा रहल अछि आ दोसर दिस जे बौद्धिक आ शारीरिक रूप सं संबल अछि ओ भगवानक भरोसे बैसल अछि। ईश्वर आत्मविश्वास, कर्मठता के रूप में अहां के भीतर हृदय में स्थित छथि ओकरा अनदेखा के क मंदिरे मंदिरे छिछियाल फिरई छथि।
माता गौरी ‘मुदा बहुत कर्मठ लोक सब सेहो सफल नहिं होईत छथिन ते ओ कत, किनका शरण में जेता, ओहो सब त भक्तक लाईन में लागल रहई छथिन।’
गणेश जी ‘ह माता एहनो लोकक पृथ्वी पर कमी नहिं अछि जे परिश्रमक संगे भक्ति करई छथि, सफलो रहई छथि मुदा हिनकर सबहक भीतर संतुष्टि के कमी रहई छनि संगहि-संग दोसरा के प्रति ईर्ष्या के भाव रहई छनि ताहि दुआरे इ सब सफल भेला के बादो संतुष्ट नहीं रहई छथि आ मंदिरे-मंदिरे छिछियाल फिरई छथि।’
माता गौरी ‘ते अहां के हिसाब सं किनका एबाक चाही मंदिर में?’
गणेश जी ‘कार्य आरंभ कर सं पहिने जदि हुनका आशिर्वाद लेबाक छनि ते आबथि आ कार्य में जुटि जाईथ आ कार्य सिद्धि के बाद धन्यवाद देब लेल आब के इच्छा होईन ते ठिक नहिं ते मानव सेबा करईथ से सबस उत्तम।’
तहन ते मंदिर सबमें भीड़ कम भे जेतई आ पंडा आ ट्रस्ट सबहक नुकसान भे जेतई, ओ सब ते दिन-राति अहिं के सेवामे लागल रहईया, ओकर सबहक की हेतई?’
गणेश जी ‘सेवा की व्यापार?’

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