मुख्यपृष्ठस्तंभमेगा-प्लान : एमएमआर में हो समानांतर बस-आधारित...सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था

मेगा-प्लान : एमएमआर में हो समानांतर बस-आधारित…सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था

-मेट्रो और लोकल के साथ एंड-टू-एंड कनेक्टिविटी जरूरी

अनिल तिवारी, मुंबई

मुंबई महानगरीय क्षेत्र यानी एमएमआर की जनसंख्या, रोजाना होनेवाली आवाजाही और बढ़ते शहरी विस्तार को देखते हुए मौजूदा सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था नाकाफी साबित हो रही है। लोकल ट्रेनें मुंबई की जीवनरेखा हैं, मेट्रो नेटवर्क तेजी से बढ़ रहा है, उपनगरीय रेलवे का विस्तार भी आवश्यक है; लेकिन इन सबकी अपनी सीमाएं हैं। रेल लाइनें हर गली, हर कार्यालय क्षेत्र, हर आवासीय कॉलोनी, हर औद्योगिक बेल्ट और हर नए टाउनशिप तक नहीं पहुंच सकतीं। मेट्रो स्टेशन तक पहुंचने और वहां से अंतिम गंतव्य तक जाने की समस्या आज भी बड़ी है। यही वह जगह है, जहां एक मजबूत, संगठित और आधुनिक बस-आधारित समानांतर सार्वजनिक परिवहन प्रणाली की जरूरत सामने आती है।
डेस्टिनेशन तक आसान पहुंच
एमएमआर में लाखों लोग रोजाना मीरा-भायंदर से अंधेरी, वसई-विरार से मुंबई, ठाणे से बीकेसी, कल्याण-डोंबिवली से नई मुंबई, पनवेल से दक्षिण मुंबई, भिवंडी से ठाणे, नई मुंबई से एयरपोर्ट क्षेत्र और अन्य अनेक दिशाओं में यात्रा करते हैं। इन यात्राओं का बड़ा हिस्सा आज निजी वाहनों, ऐप-वैâब, ऑटो, बाइक या अनियमित बस सेवाओं पर निर्भर है। इससे सड़कों पर भारी दबाव बनता है। यदि सार्वजनिक परिवहन केवल रेल और मेट्रो पर निर्भर रहेगा तो निजी वाहनों की संख्या घटने की बजाय बढ़ती रहेगी। इसलिए एमएमआर को एक मजबूत ‘एंड-टू-एंड बस मोबिलिटी नेटवर्क’ की आवश्यकता है। इस व्यवस्था को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी मॉडल पर विकसित किया जा सकता है। सरकार रूट, नियमन, किराया-ढांचा, सेवा मानक, सुरक्षा, डिजिटल टिकटिंग और निगरानी तय करे; जबकि निजी ऑपरेटर निर्धारित शर्तों के तहत बसें चलाएं। यह व्यवस्था अनियंत्रित निजी बस सेवा जैसी नहीं होनी चाहिए, बल्कि सरकारी नियंत्रण और निजी दक्षता का संतुलित मॉडल हो। जैसे मेट्रो और लोकल बड़े कॉरिडोर पर यात्रियों को ले जाती हैं, वैसे ही बस सेवा उन्हें घर से स्टेशन और स्टेशन से कार्यालय तक पहुंचाने वाली रीढ़ बने।
इस समानांतर बस प्रणाली को तीन स्तरों पर विकसित किया जा सकता है। पहला स्तर हो बड़े ट्रंक कॉरिडोर। इसमें उच्च क्षमता वाली इलेक्ट्रिक या सीएनजी बसें प्रमुख रोजगार और आवासीय केंद्रों को जोड़ें। जैसे मीरा-भायंदर, अंधेरी-बीकेसी, ठाणे-बीकेसी, कल्याण-ठाणे-नई मुंबई, पनवेल-वाशी-दादर, वसई-विरार-बोरीवली-अंधेरी, भिवंडी-ठाणे-मुलुंड जैसे रूट। इन रूट्स पर बसें निश्चित समय, उच्च आवृत्ति और डिजिटल ट्रैकिंग के साथ चलें। दूसरा स्तर हो, मिनी बस और मिडी बस नेटवर्क। एमएमआर की कई सड़कें संकरी हैं, कॉलोनियां अंदर हैं, औद्योगिक क्षेत्रों के भीतर बड़ी बसों का जाना कठिन है। वहां २० से ३० सीटों वाली मिनी बसें, ई-मिनी बसें और मिडी बसें चलाई जा सकती हैं। ये बसें मेट्रो स्टेशन, लोकल स्टेशन, बस टर्मिनल, बड़े कार्यालय परिसर, अस्पताल, स्कूल, बाजार और आवासीय क्षेत्रों को जोड़ें। इससे ऑटो और निजी दोपहिया पर निर्भरता घटेगी। तीसरा स्तर हो, फीडर और शटल सेवा। हर बड़े रेलवे स्टेशन, मेट्रो स्टेशन और बस टर्मिनल के आस-पास ३ से ५ किलोमीटर के दायरे में नियमित फीडर सेवा चलनी चाहिए। यह सेवा ऐसी हो कि यात्री को स्टेशन से बाहर निकलते ही पता हो कि उसके क्षेत्र की शटल हर ५ या १० मिनट में उपलब्ध है। यदि अंतिम मील की समस्या हल नहीं होगी तो लोग निजी वाहन या ऑटो का उपयोग जारी रखेंगे।
एमएमआर में बस सेवा को प्रभावी बनाने के लिए केवल बसें खरीदना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए एकीकृत रूट प्लानिंग आवश्यक है। आज अलग-अलग महानगरपालिकाओं की बस सेवाएं अपनी सीमाओं में सोचती हैं, जबकि यात्री की यात्रा नगर सीमा से परे होती है। इसलिए एमएमआर स्तर पर एक केंद्रीय बस रूट प्राधिकरण होना चाहिए, जो बेस्ट, टीएमटी, एनएमएमटी, एमबीएमटी, वीवीएमटी, केडीएमटी और अन्य सेवाओं के साथ निजी पीपीपी ऑपरेटरों का समन्वय करे। कौन-सा रूट किसे चलाना है, कहां बसों की कमी है, कौन-सा रूट ओवरलैप हो रहा है, कहां मिनी बस चाहिए और कहां बड़ी बस यह निर्णय डेटा के आधार पर होना चाहिए।
आसान बने सफर
पीपीपी बस मॉडल में किराया व्यवस्था भी संतुलित होनी चाहिए। यदि किराया बहुत अधिक होगा, तो लोग निजी बाइक या शेयर ऑटो ही चुनेंगे। यदि किराया बहुत कम होगा तो सेवा आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं रहेगी। इसलिए डिस्टेंस बेस्ट फेयर, मंथली पास, स्टूडेंट पास, सीनियर सिटिजन कंसेशन और इंटीग्रेटेड मोबिलिटी कार्ड की व्यवस्था होनी चाहिए। एक ही कार्ड से बस, मेट्रो, लोकल और वॉटर ट्रांसपोर्ट में यात्रा की सुविधा मिले। कॉरपोरेट क्षेत्रों के लिए विशेष बस मॉडल बनाया जा सकता है। बीकेसी, लोअर परेल, अंधेरी, गोरेगांव, मालाड, पवई, नई मुंबई, ठाणे, ऐरोली, घनसोली, वाशी और पनवेल जैसे रोजगार केंद्रों में हजारों कर्मचारी रोजाना निजी वाहनों से आते हैं। सरकार बड़ी कंपनियों को प्रोत्साहित या बाध्य कर सकती है कि वे अपने कर्मचारियों के लिए साझा इलेक्ट्रिक बस सेवा का उपयोग करें। कॉरपोरेट बसें केंद्रीय ऐप से जुड़ी हों, खाली सीटों का उपयोग अन्य पंजीकृत यात्रियों को भी दिया जा सके। इससे कंपनियों की पार्विंâग जरूरत कम होगी और सड़कों पर कारों की संख्या घटेगी।
स्कूल, कॉलेज और अस्पताल क्षेत्रों के लिए भी विशेष मिनी बस और शटल सेवा की जरूरत है। स्कूल के समय हजारों निजी कारें स्कूल गेट पर लगती हैं। यदि सुरक्षित, जीपीएस आधारित, निगरानी वाली स्कूल-क्लस्टर बस सेवा हो तो अभिभावकों को बच्चों को निजी वाहन से छोड़ने की आवश्यकता कम होगी। बड़े अस्पतालों के लिए भी स्टेशन से शटल सेवा होनी चाहिए, ताकि मरीज और परिजन टैक्सी या ऑटो पर निर्भर न रहें।
बस प्रणाली को इलेक्ट्रिक मोबिलिटी से जोड़ा जाना चाहिए। एमएमआर में नई पीपीपी बस सेवा का अधिकांश हिस्सा इलेक्ट्रिक बसों पर आधारित हो। छोटे रूट्स पर मिनी ई-बसें और लंबी दूरी पर हाई रेंज इलेक्ट्रिक बसेज चलाई जा सकती हैं। जिन रूट्स पर अभी ईवी व्यावहारिक न हो, वहां सीएनजी को संक्रमण विकल्प माना जा सकता है। हर बड़े डिपो, मेट्रो स्टेशन, बस टर्मिनल और कॉरपोरेट हब में चार्जिंग सुविधा विकसित हो।
बसों को सड़क पर प्राथमिकता देना भी अनिवार्य है। यदि बस उसी जाम में फंसी रहेगी, जिसमें निजी कार फंसी है तो यात्री बस क्यों चुनेगा? प्रमुख कॉरिडोरों पर डेडीकेटेड बस लाइन, सिग्नल प्रायोरिटी, बस बे और क्लियर बस स्टॉप जोन बनाए जाने चाहिए। जहां पूर्ण बस लेन संभव न हो, वहां पिक- आवर बस प्रायोरिटी लेन लागू की जा सकती है। सड़क पर अवैध पार्विंâग और फेरीवालों से बस स्टॉप मुक्त होने चाहिए।
पीपीपी मॉडल में सेवा मानक स्पष्ट हों। बस कितनी साफ होगी, कितनी देर में आएगी, कितनी भीड़ होने पर अतिरिक्त बस लगेगी, ड्राइवर का प्रशिक्षण वैâसा होगा, महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा वैâसे होगी, सीसीटीवी और पैनिक बटन होंगे या नहीं, जीपीएस ट्रैकिंग होगी या नहीं, ये सब अनुबंध में लिखा होना चाहिए। केवल रूट देकर निजी बस चलवा देना समाधान नहीं है। सेवा खराब हुई तो लोग फिर निजी वाहन की ओर लौटेंगे। इस व्यवस्था में डिजिटल तकनीक की भूमिका केंद्रीय होगी। हर बस जीपीएस से जुड़ी हो। यात्री ऐप पर देख सके कि बस कब आएगी, कितनी भीड़ है, किराया कितना है, अगला कनेक्शन कौन-सा है। बसों का डेटा सेंट्रल कमांड सेंटर में जाए। जिस रूट पर भीड़ अचानक बढ़े, वहां अतिरिक्त बस भेजी जाए। जिस रूट पर यात्रियों की संख्या कम हो, वहां बस का आकार या आवृत्ति बदली जाए। यह व्यवस्था स्थिर टाइमटेबल नहीं, डिमांड रिस्पोंसिव मोबिलिटी होनी चाहिए।
लचीला माध्यम
एमएमआर में लॉजिस्टिक और पैसेंजर ट्रैफिक अलग करने के साथ बस सेवा का विस्तार बेहद जरूरी है। यदि नागरिक को भरोसेमंद सार्वजनिक परिवहन मिलेगा तो निजी कार, बाइक और ऐप-वैâब का उपयोग कम होगा। इससे ट्रैफिक जाम, पार्विंâग दबाव, र्इंधन खपत और प्रदूषण सब घटेंगे। बस सेवा का लाभ यह है कि वह रेल की तुलना में कम लागत में तेजी से शुरू हो सकती है और रूट बदलने का लचीलापन भी देती है।
इस मॉडल को लागू करने के लिए पहले २५ से ५० उच्च मांग वाले रूट्स की पहचान की जाए। फिर उन पर पायलट आधार पर पीपीपी इलेक्ट्रिक बस सेवा शुरू हो। अगले चरण में मिनी बस फीडर नेटवर्क जोड़ा जाए। तीसरे चरण में कॉरपोरेट, स्कूल, अस्पताल और औद्योगिक क्लस्टर शटल शामिल हों। चौथे चरण में इसे सभी महानगरपालिकाओं के संयुक्त एमएमआर सार्वजनिक परिवहन कमांड से जोड़ा जाए।
अंतत: मुंबई और एमएमआर को यह समझना होगा कि मेट्रो और लोकल महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे अकेले शहर का बोझ नहीं उठा सकते। बस सेवा ही वह लचीला माध्यम है जो घर, स्टेशन, कार्यालय, बाजार, स्कूल, अस्पताल और औद्योगिक क्षेत्र को जोड़ सकती है। यदि बस सेवा मजबूत होगी तो सड़क पर निजी वाहनों की संख्या कम होगी। यदि बस सेवा कमजोर रही तो हर नई सड़क कुछ वर्षों में फिर जाम से भर जाएगी। एमएमआर में अब आवश्यक हो गया है कि मेट्रो लंबी दूरी दे, लोकल रीढ़ बने, बस घर से मंजिल तक पहुंचाए। बड़ी बस मुख्य मार्ग पर, मिनी बस अंदरूनी मार्ग पर, शटल अंतिम मील पर। निजी वाहन कम करने हैं तो सार्वजनिक परिवहन को दरवाजे तक लाना होगा।

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