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चाकू की नोक पर मुंबई लोकल!.. भीड़ से मारो या अपराधी के हथियार से?

अनिल तिवारी

छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस के बाहर हाथ में धारदार कोयता लेकर लोगों को आतंकित करने और एक महिला को धमकाने वाले व्यक्ति की गिरफ्तारी ने मुंबई उपनगरीय रेलवे की सुरक्षा पर फिर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। घटना में किसी के घायल होने की सूचना नहीं है, लेकिन महानगर के सबसे महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन के बाहर हथियार लहराया जाना सुरक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति बताने के लिए पर्याप्त है।
कुछ दिन पहले चर्चगेट-नालासोपारा लोकल में दरवाजा बंद करने के मामूली विवाद के बाद मयंक लोहार की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। इसके करीब ४८ घंटे बाद माहिम स्टेशन के पास एक छोटे से विवाद में चाकू निकल आया। स्टेशन के पास आकस्मिक रूप से टकराने पर ३५ वर्षीय व्यक्ति ने माफी मांगी, लेकिन हमलावर ने कथित रूप से उसे चाकू मार दिया और फरार हो गया। लोकल में हाल की हत्या के बाद इस घटना ने रेलवे क्षेत्र की सुरक्षा पर सवाल बढ़ाए हैं। उधर सीएसएमटी के बाहर कोयता लहराने की घटना सामने आई है। ये घटनाएं अलग-अलग अपराध भर नहीं हैं, बल्कि रेलवे परिसर में हथियारों की आसान पहुंच और अपराधियों के बढ़ते दुस्साहस का संकेत हैं। ऐसा लगने लगा है मानो पूरी मुंबई रेलवे चाकू की नोक पर हो।
दरअसल, मुंबई लोकल में यात्रियों को दोहरे खतरे का सामना करना पड़ता है। एक ओर बेतहाशा भीड़, खुले दरवाजे, पटरियां पार करने की मजबूरी और प्लेटफॉर्म पर धक्का-मुक्की जान ले रही है। दूसरी ओर चोरी, झपटमारी, महिलाओं से छेड़छाड़, नशे का कारोबार, मारपीट और चाकूबाजी जैसी घटनाएं यात्रियों में असुरक्षा बढ़ा रही हैं। वर्ष २०२५ में मुंबई रेलवे क्षेत्र में २,२८७ यात्रियों की विभिन्न दुर्घटनाओं में मौत हुई और २,५५४ लोग घायल हुए। यानी औसतन प्रतिदिन छह से अधिक लोगों की जान गई। वर्ष दर वर्ष इन आंकड़ों पर चर्चा होती है पर दुर्घटनाओं में मौत पर अंकुश लगाने का कोई कारगर कार्यक्रम सरकार अमल में नहीं ला पाती।
सवाल यह है कि लाखों यात्रियों वाले इस नेटवर्क में सुरक्षा जांच लगभग नदारद क्यों है? कई स्टेशनों पर लगाए गए मेटल डिटेक्टर या तो सीमित प्रवेश द्वारों पर हैं अथवा उनसे बिना जांच के यात्री निकल जाते हैं। सामान की आकस्मिक जांच, संदिग्ध व्यक्तियों की पहचान और प्लेटफॉर्म पर सक्रिय निगरानी का प्रभाव शायद ही दिखाई देता है। कोई व्यक्ति चाकू, कोयता या अन्य प्रतिबंधित वस्तु लेकर स्टेशन परिसर तक पहुंच जाए तो उसे रोकने की विश्वसनीय व्यवस्था क्या है?
मेट्रो और हवाई अड्डों पर प्रवेश नियंत्रित है, बैग स्वैâन होते हैं और सुरक्षाकर्मी प्रत्येक प्रवेश द्वार पर तैनात रहते हैं। मुंबई के सभी लोकल स्टेशनों पर हू-ब-हू वही व्यवस्था लागू करना भीड़ और स्टेशन संरचना के कारण कठिन हो सकता है, लेकिन चरणबद्ध जांच क्यों नहीं हो सकती? संवेदनशील स्टेशनों पर स्वैâनर, काम करने वाले मेटल डिटेक्टर, सादे कपड़ों में पुलिस, प्लेटफॉर्मवार गश्त और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सीसीटीवी निगरानी लागू की जा सकती है। केंद्र सरकार बुलेट ट्रेन और विश्वस्तरीय स्टेशनों की बात करती है, लेकिन रोजी-रोटी के लिए लोकल पर निर्भर सामान्य यात्री को सुरक्षित यात्रा का अधिकार कब मिलेगा? अपराध के बाद सैकड़ों वैâमरों की फुटेज देखकर आरोपी पकड़ना सराहनीय है, पर असली सुरक्षा वह होगी जो हथियार को ट्रेन तक पहुंचने ही न दे।
मुंबई लोकल महानगर की जीवनरेखा है। लेकिन जब परिवार का सदस्य घर से निकलने के बाद लौटने तक परिजनों के मन में अनहोनी का डर बना रहे, तो इसे केवल परिवहन व्यवस्था नहीं, गंभीर मानवीय और प्रशासनिक संकट माना जाना चाहिए। रेलवे, राज्य सरकार, जीआरपी और आरपीएफ को जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने के बजाय समयबद्ध संयुक्त सुरक्षा ब्लूप्रिंट जारी करना होगा।

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