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मुस्लिम वर्ल्ड : होर्मुज बंद, तब भी कई देश मालामाल!.. युद्ध से कौन-कौन छाप रहा नोट?

सूफी खान

आपदा में अवसर की कहावत तो आपने सुनी होगी। कोरोना काल में हमने देखा भी कि सेनेटाइजर और मेडिकल इंडस्ट्री में कितना बड़ा बूम आया था। इसी तरह मिडिल ईस्ट में भी हो रहा है। आप सोच रहे होंगे कि मिडिल ईस्ट जहां इस वक्त तनाव है और पूरी दुनिया परेशान है। दुबई जैसे शहरों की सुरक्षित होने की इमेज को धक्का लगा है, वहां इस आपदा में किस को फायदा हो रहा है। लेकिन सच्चाई तो यही है कि ऐसे कई देश हैं जो मोटा पैसा कूट रहे हैं, मौजूदा सूरतेहाल में।
दरअसल, तेल-गैस परिवहन के अहम समुद्री रास्ते स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में पैदा हुए संकट ने पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार को झकझोर कर रख दिया। दुनिया के समुद्री रास्ते से होने वाले कच्चे तेल के कारोबार का करीब २० प्रतिशत हिस्सा यहीं से होकर गुजरता है। ऐसे में इसके बंद होने या यहां तनाव बढ़ने की आशंका मात्र से ही अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल और गैस की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला। हालांकि, इस संकट ने जहां कई तेल खरीदने वाले देशों की मुश्किलें बढ़ा दीं, वहीं रूस, अमेरिका, सऊदी अरब और नॉर्वे जैसे ऊर्जा बेचने वाले देशों के लिए यह आपदा, अवसर बनकर आई है।
तेल की कीमतों में आई तेजी का सबसे बड़ा फायदा रूस को हुआ। रूस के वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, मई महीने में तेल और गैस से मिलने वाला उसका टैक्स पिछले साल के मुकाबले ३२.४ प्रतिशत बढ़कर ६७८.९ अरब रूबल यानी ९.३ अरब डॉलर तक पहुंच गया। इससे रूसी ऊर्जा क्षेत्र को एक नया बूस्ट मिला। चार साल से यूक्रेन के साथ जंग में उलझे और अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहे रूस के लिए ये सुनहरा मौका बन गया है। वो अपना तेल एशियाई बाजारों में बेच रहा है। होर्मुज में ईरान के जरिए कंट्रोल किए जाने के बाद अमेरिका ने भी कुछ देशों को ढील दी कि वो रूस का तेल खरीद सकते हैं। हालांकि, व्यावहारिक रूप से अमेरिका ने अभी इसे जाहिर नहीं किया, लेकिन जब ऑप्शन ही नहीं है तो दुनिया को कहीं ना कहीं से तो ऊर्जा जरूरतें पूरी करनी ही पड़ेंगी।
अमेरिका ने भी कुछ परिस्थितियों में सहयोगी देशों की ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए प्रतिबंध व्यवस्था के तहत विभिन्न प्रकार की छूट और एक समय सीमा बनाकर दी। तो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर तनाव से सिर्फ रूस ही मजबूत नहीं हुआ, बल्कि खुद अमेरिका, सऊदी अरब, ओमान और नॉर्वे ने भी इस स्थिति का लाभ उठाया। दुनिया के प्रमुख एलएनजी और तेल उत्पादकों में शामिल अमेरिका ने यूरोप और एशिया की तरफ महंगे दामों पर तेल बेचना शुरू किया। यूरोपीय देशों ने मिडिल ईस्ट की तरफ से तेल आपूर्ति में आ रही दिक्कतों और एक लंबे संकट को देखते हुए अमेरिकी एलएनजी की खरीद तेज कर दी।

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