मुख्यपृष्ठस्तंभमुस्लिम वर्ल्ड: ईरान को बर्बाद करने निकले थे ट्रंप!

मुस्लिम वर्ल्ड: ईरान को बर्बाद करने निकले थे ट्रंप!

सूफी खान

कतर और यूएई ने बाजी ही पलट दी

जिस ईरान को हालिया युद्ध के बाद आर्थिक रूप से पूरी तरह घेर लेने की बातें हो रही थीं, अब उसी ईरान को लेकर वेस्ट एशिया की तस्वीर बदलती नजर आ रही है। अमेरिका जहां पिछले करीब ५० सालों से ईरान पर सेंशन्स लगाए हुए है,वहीं अब ४० दिनों की जंग में ईरान की ताकत को परख लेने के बाद अरब खित्ते के कुछ देश ईरान के लिए आर्थिक राहत के रास्ते तलाशते दिखाई दे रहे हैं। यूएई के बाद अब कतर की ओर से भी ईरान के लिए १२ अरब डॉलर के पैकेज का प्रस्ताव लाने की चर्चा है। ईरान ने अमेरिका के साथ डील की १४ सूत्रीय शर्तों में ये साफ कर दिया है कि किसी भी समझौते से पहले उसे विदेशों में प्रâीज की गई अपनी संपत्तियों तक पहुंच मिलनी चाहिए। बताया जा रहा है कि कतर में मौजूद करीब १२ अरब डॉलर की राशि को लेकर बातचीत तेज हुई है और इसी को लेकर संभावित आर्थिक पैकेज की चर्चा हो रही है। दिलचस्प बात यह है कि कुछ समय पहले तक ऐसी अटकलें लगाई जा रही थीं कि अमेरिका प्रâीज किए गए ईरानी फंड्स का इस्तेमाल खाड़ी देशों को युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई के लिए कर सकता है। लेकिन अब तस्वीर बिल्कुल उलटती दिख रही है। जिन देशों को ईरान के हमलों से खतरा महसूस हुआ था, वही देश अब ईरान के साथ समझौते की राह तलाशते दिख रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि जिस यूएई पर ईरान ने मिसाइल और ड्रोन हमले किए, वही देश ईरान के लिए नरम रुख क्यों अपना रहा है? एक्सपर्ट कहते हैं कि इसके पीछे सीधे तौर पर आर्थिक असुरक्षा का मामला है। यूएई जैसे देशों की इकोनॉमी निवेश और चमक-दमक के दम पर चलती है। ईरान ने उसे अच्छा खासा डेंट मारा है। ऐसे में इन देशों के लिए ईरान से समझौता कर लेना ही बेहतर है। यूएई की अर्थव्यवस्था व्यापार, पर्यटन, शिपिंग और वित्तीय सेवाओं पर आधारित है। युद्ध और तनाव बढ़ने से सबसे बड़ा खतरा दुबई और अबू धाबी जैसे आर्थिक केंद्रों को होता है। जानकारों का कहना है कि अगर आर्थिक राहत देकर भविष्य के हमलों और क्षेत्रीय अस्थिरता को रोका जा सकता है, तो खाड़ी देश उसी रास्ते को चुनना चाहेंगे। ईरान को पैसा देना कोई मेहरबानी नहीं बल्कि अपना बचाव है। इस पूरे घटनाक्रम में होर्मुज स्ट्रेट की भूमिका भी बेहद अहम है। दुनिया के करीब २० प्रतिशत तेल का कारोबार इसी समुद्री मार्ग से होता है। यदि ईरान और पश्चिमी देशों के बीच तनाव बना रहता है या यह रास्ता बाधित होता है, तो उसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार, शिपिंग लागत और खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है। अगर कतर का १२ अरब डॉलर का प्रस्ताव और खाड़ी देशों की मध्यस्थता आगे बढ़ती है, तो इसका असर अमेरिका की रणनीति पर भी पड़ सकता है। अमेरिकी प्रतिबंध लंबे समय से ईरान को अलग-थलग करने का प्रमुख हथियार रहे हैं। लेकिन अगर अमेरिका के करीबी सहयोगी ही ईरान के लिए आर्थिक रास्ते खोलते दिखाई देते हैं, तो यह संकेत होगा कि खाड़ी देश अमेरिका की हां में हां मिलाने से बेहतर अपने भविष्य के लिए सोच रहे हैं। फिलहाल, इतना तय है कि पश्चिम एशिया की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है।

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