मुख्यपृष्ठग्लैमरनाना सर…एक रिश्ता, जो हमेशा मेरे दिल में जिंदा रहेगा

नाना सर…एक रिश्ता, जो हमेशा मेरे दिल में जिंदा रहेगा

सुनील सिरवैया

“कैसा है सिरवैया…क्या कर रहा है हज्जाम…मुंबई आ रहा हूं, कल मिलते हैं…”
नाना सर के कहे ये शब्द आज भी मेरे कानों में गूंजते रहते हैं। उनकी आवाज, उनका अंदाज और मुझे पुकारने का उनका वह अपना-सा लहजा…सब कुछ आज भी वैसा ही महसूस होता है, जैसे कल ही की बात हो।
हम कल शाम को मिलने वाले थे। और हम मिले भी…मगर अफसोस, मिलने की जगह बदल गई थी। मुंबई मैरियट की जगह पुणे के उनके प्रिय फार्महाउस पर मुलाकात हुई। फ्रक सिर्फ इतना था कि इस बार वे सशरीर हमारे बीच नहीं थे। हम उनसे मिलने तो पहुंचे, लेकिन इस बार मुलाकात मरणोपरांत थी।
जिंदगी भी कितनी अजीब है! कभी-कभी वह हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है, जहां मन कुछ और चाहता है और हकीकत कुछ और होती है। जिस इंसान से मिलने की खुशी मन में होती है, उसी से मिलने के लिए एक दिन हम उसकी यादों का सहारा लेकर पहुंचते हैं।
विडंबना देखिए, नाना सर से मेरी पहली मुलाकात भी उनके उसी प्रिय फार्महाउस पर हुई थी, जिसे वे बड़े अपनेपन से ‘खेत’ कहते थे। जब अनिल शर्मा जी ने उन्हें वनवास की कहानी सुनाने के लिए फोन किया था, तो नाना सर ने बस इतना कहा था—
“आ जा खेत पे…”
उनके कहने का यही अंदाज़ था। न कोई औपचारिकता, न कोई बनावट। बस, आ जा खेत पर!
लेकिन उस पहली मुलाक़ात तक पहुँचने से पहले मेरे मन में एक अलग ही उथल-पुथल चल रही थी।
सच कहूँ, तो मैं नाना सर से मिलने को लेकर काफ़ी हिचक रहा था। फ़िल्म इंडस्ट्री में आने से पहले ही उनके बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। लोगों से सुना था कि वे बेहद स्पष्टवादी हैं, तेज़ स्वभाव के हैं और अगर कोई बात उन्हें पसंद न आए, तो सामने वाले को बेझिझक डाँट भी देते हैं। लिहाज़ा, उनके सामने जाने की कल्पना भर से मन में एक डर था। समझ नहीं आ रहा था कि पहली मुलाक़ात कैसी रहेगी और वे मेरे साथ किस तरह पेश आएँगे।
लेकिन दूसरी तरफ़, नाना सर के प्रति मेरे मन में बचपन से ही अपार सम्मान और प्रेम था। मैंने उनकी फ़िल्में देखते हुए उन्हें पसंद करना शुरू किया था। उनके अभिनय की एक ख़ासियत मुझे हमेशा आकर्षित करती थी। वे सिर्फ़ किरदार नहीं निभाते थे, बल्कि उन किरदारों के ज़रिए लोगों के मन में कुछ ऐसा छोड़ जाते थे, जो फ़िल्म ख़त्म होने के बाद भी उनके साथ रहता था।
अंकुश, प्रहार, तिरंगा और क्रांतिवीर जैसी फ़िल्मों में उनके निभाए किरदारों को याद कीजिए। ये महज़ फ़िल्मों के किरदार नहीं थे, बल्कि अपने भीतर एक विचार, एक उद्देश्य और एक गहरी संवेदना लिए हुए थे। उनके अभिनय में एक ऐसी सच्चाई थी, जो दर्शकों को भीतर तक झकझोर देती थी।
तिरंगा में उनका पुलिसवाला हो या क्रांतिवीर का जुझारू नौजवान, उनके किरदार लोगों को प्रेरित करते थे। वे सोचने पर मजबूर करते थे कि अगर ज़िंदगी में कुछ करना है, अगर अपने सिद्धांतों के लिए खड़ा होना है, तो हिम्मत और ईमानदारी के साथ खड़ा होना चाहिए। उसी तरह प्रहार में एक सैनिक के रूप में उनका अनुशासन, समर्पण और देश के प्रति उनका जज़्बा देखकर न जाने कितने युवाओं के मन में सेना में जाने की इच्छा जागी होगी। कितनों ने उनके उस किरदार को देखकर सोचा होगा कि उन्हें भी ऐसा ही जीवन जीना है।
यही नाना पाटेकर के अभिनय की ताक़त थी। वे दर्शकों का केवल मनोरंजन नहीं करते थे, बल्कि उन्हें सोचने, महसूस करने और अपने जीवन को एक अलग नज़रिए से देखने की प्रेरणा देते थे।
मैं उनका बहुत बड़ा प्रशंसक था। उन्हें देखकर, उनके किरदारों को महसूस करके मेरे मन में उनके प्रति एक ऐसा अपनापन पैदा हो गया था, मानो वे मेरे परिवार के ही कोई सदस्य हों। हालाँकि, हक़ीक़त यह थी कि मैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानता तक नहीं था। मेरा उनसे कोई परिचय नहीं था। मैंने उन्हें सिर्फ़ पर्दे पर देखा था। मगर कभी-कभी किसी कलाकार का काम उसके और दर्शक के बीच ऐसा रिश्ता बना देता है, जिसमें मुलाक़ात की ज़रूरत नहीं पड़ती। वह इंसान आपको अपना-सा लगने लगता है।
नाना सर के साथ भी मेरा रिश्ता कुछ ऐसा ही था।
और अब, वर्षों से पर्दे पर देखे उस इंसान से पहली बार मिलने का समय आ गया था।
मैं रास्ते में था, तभी तब मेरे डायरेक्टर अनिल शर्मा जी ने मुझे नाना सर के स्वभाव के बारे में कुछ और बातें बताईं। उन्होंने कहा, “तुमने मिथुन दा के साथ काम किया है, नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी के साथ काम किया है, उत्कर्ष के साथ काम किया है और अपने 2 के लेखन के दौरान सनी देओल सर के साथ भी डिस्कशन किया है। ये सभी बहुत इंटेलिजेंट कलाकार हैं, लेकिन नाना एकदम अलग व्यक्ति हैं। उनसे जो भी कहना, सोच-समझकर कहना। कोई आइडिया देना हो या कोई डायलॉग सुनाना हो, तो पूरी तैयारी के साथ कहना। हमें नहीं मालूम कि वे किस बात पर कैसे रिएक्ट करेंगे। इसलिए अपनी बात में लॉजिक ज़रूर रखना।”
अनिल जी की ये बातें सुनकर मैं और भी घबरा गया।
मन में तरह-तरह के ख़याल आने लगे। ग़लतियाँ तो हर किसी से होती हैं। कोई बात कहते समय कभी कोई चूक हो सकती है, किसी विचार को समझाने में कोई कमी रह सकती है। अगर मुझसे ऐसा कुछ हो गया, तो नाना सर क्या सोचेंगे? क्या कहेंगे?
इन्हीं तमाम आशंकाओं और सवालों के बीच हम उनके फ़ार्महाउस पहुँचे। उस जगह का नाम था ‘नानाची वाड़ी’। अगस्त का महीना था और बारिशें हो रही थीं। जैसे ही हमारी गाड़ी नानाची वाड़ी के मुख्य द्वार से भीतर दाख़िल हुई, वहाँ मौजूद कर्मचारी हमारी अगवानी के लिए दौड़ पड़े। हमारे आने की ख़बर पहले से थी और हमारी ख़ातिरदारी का पूरा इंतज़ाम था।
और फिर एक ऐसी बात हुई, जिसने मन को छू लिया। हमें लेने के लिए ख़ुद नाना सर के बेटे मल्हार आए। बारिश हो रही थी, इसलिए वे छाता लेकर हमारी तरफ़ आए और हमें अपने साथ अंदर ले गए।
उस पल तक मेरे मन में नाना सर की जो छवि बनी हुई थी, वह अब भी कहीं न कहीं मौजूद थी। लेकिन अगले ही कुछ पलों में जो देखने वाला था, उसने मेरी उस छवि को एक बिल्कुल नया अर्थ दे दिया।
और फिर मैंने उन्हें देखा…
साधारण-सा पायजामा, कुर्ता और गले में एक गमछा। वे सीढ़ियों से उतरते हुए हॉल की तरफ़ आ रहे थे। न कोई दिखावा, न कोई बनावट, न अपने बड़े अभिनेता होने का कोई आडंबर। उनके व्यक्तित्व में एक ऐसी सहजता थी, जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है।
उनके बारे में सुने हुए क़िस्सों और तस्वीरों के ज़रिए मुझे उनकी सादगी का कुछ अंदाज़ा ज़रूर था, लेकिन किसी इंसान को तस्वीरों में देखना और उसे अपने सामने सजीव देखना, दोनों में बहुत फ़र्क़ होता है।
उस दिन मैंने उन्हें पहली बार सामने देखा था। चेहरे पर साधारण-सा गोल चश्मा, पहनावे में सादगी और पूरे व्यक्तित्व में एक अनोखा अपनापन। मैं उन्हें देखता ही रह गया।
मुझे आज भी याद है, वे अनिल जी से पुरानी फ़िल्मों और उनसे जुड़ी बातें कर रहे थे। इतने में उनकी आवाज़ गूँजी—
“आ जा रे, आ जा! आ जा, आ जा! अनिल… आ जा रे! तू पच्चीस साल बाद कोई फ़िल्म करने आया है! ये है, वो है…”
वे अपने उसी सहज, बेबाक और आत्मीय अंदाज़ में बातें कर रहे थे। उनकी आवाज़ में जो अपनापन था, उसे देखकर मैं मन ही मन हैरान था। जिस इंसान से मिलने के नाम पर मैं रास्ते भर घबरा रहा था, उसके व्यवहार में तो एक अलग ही गर्मजोशी थी।
फिर उन्होंने हमारी तरफ़ देखा। मेरे साथ हमारे साथी लेखक अमजद अली भी थे। मैं नाना सर को बस देखे जा रहा था। मन में एक अजीब-सा भाव था। जिस कलाकार को इतने वर्षों से पर्दे पर देखता आया था, वह आज मेरे सामने खड़ा था।
आख़िरकार मैं आगे बढ़ा और उनके पैर छूने के लिए झुका।
लेकिन नाना सर की एक ख़ास आदत थी। वे किसी को अपने पैर नहीं छूने देते थे। अगर कोई उनके पैर छूने के लिए झुकता, तो वे ख़ुद भी उसके पैर छूने के लिए झुक जाते थे। मानो वे सामने वाले को यह एहसास कराना चाहते हों कि सम्मान किसी एक व्यक्ति का अधिकार नहीं, बल्कि हर इंसान के भीतर मौजूद उस ईश्वर का सम्मान है, जो हम सबमें बसता है।
उन्होंने मुझे रोकते हुए कहा—
“भाई, तू मेरे पैर क्यों छू रहा है? मैं भी तेरे पैर छूता हूँ।
उनके ये शब्द मेरे लिए सिर्फ़ शब्द नहीं थे। वह एक ऐसा भाव था, जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। मैं तो उनके सामने एक प्रशंसक और लेखक के रूप में खड़ा था, लेकिन उन्होंने मुझे बराबरी का सम्मान दिया। मेरे भीतर के उस इंसान को सम्मान दिया, जिसे शायद मैं ख़ुद भी उस पल महसूस नहीं कर पा रहा था।
उन्होंने मुझे पैर छूने से रोक लिया और अपने गले से लगा लिया।
उस एक आलिंगन ने मेरे मन में बैठा सारा डर जैसे पल भर में दूर कर दिया। जिस व्यक्ति को लेकर मैं सोच रहा था कि न जाने उनसे बात कैसे होगी, उन्होंने पहली ही मुलाक़ात में मुझे अपनेपन का ऐसा एहसास कराया कि मैं उसे आज तक भूल नहीं पाया हूँ।
तभी अनिल शर्मा जी ने मेरा परिचय कराते हुए कहा, “ये मेरा लेखक है, सुनील सिरवैया। हमने मिलकर यह फ़िल्म लिखी है और आपको कहानी सुनाने के लिए ही हम यहाँ आए हैं। ये हमारे दूसरे लेखक अमजद अली हैं।”
नाना सर ने हमारी तरफ़ देखा और अपने उसी अंदाज़ में बैठने का इशारा किया।
“आ जा, आ जा! बैठ, बैठ, बैठ!”
हम उनके हॉल में रखे सोफ़े पर बैठ गए। मैं अब भी उन्हें बड़े ध्यान से देख रहा था। मन में एक तरफ़ उनके व्यक्तित्व के प्रति वर्षों से जमा प्रशंसा थी, तो दूसरी तरफ़ सामने बैठे उस बेहद सहज इंसान को देखकर एक अलग ही सुकून महसूस हो रहा था।
कुछ ही देर में उन्होंने एक बड़ी-सी डलिया हमारी तरफ़ खिसका दी और कहा, “ये लो!”
उस डलिया में देसी केले भरे हुए थे। छोटे, मोटे और बिल्कुल वैसे, जैसे गाँवों में मिलते हैं। उन्होंने डलिया हमारी तरफ़ बढ़ाते हुए कहा—
“एक-एक करके खाओ। खाना बन रहा है, तैयार हो रहा है। तुम लोगों के लिए ख़ुद बनाया है हमने।”
मैं उनकी तरफ़ देखता रह गया।
जिस व्यक्ति से मिलने के नाम पर मैं रास्ते भर घबराता रहा था, वह हमें अपने घर में बिठाकर इतने प्यार से खिला रहा था। न कोई औपचारिकता, न कोई बनावटी मेहमाननवाज़ी। बस, घर आए मेहमानों के लिए अपनेपन से भरा व्यवहार।
उस दिन नानाची वाड़ी में मैंने नाना पाटेकर को पहली बार क़रीब से देखा था। पर्दे पर अपने किरदारों से लोगों के दिलों में जगह बनाने वाले उस महान अभिनेता के भीतर एक ऐसा सहज, विनम्र और आत्मीय इंसान भी था, जिसने पहली ही मुलाक़ात में मेरा दिल जीत लिया।
मैं वहाँ एक प्रशंसक के रूप में पहुँचा था, मन में कई आशंकाएँ लेकर। लेकिन उनकी सादगी, उनके व्यवहार और उनके उस आलिंगन ने मुझे यह एहसास करा दिया कि किसी इंसान को दूर से देखकर उसके बारे में राय बनाना और उसे वास्तव में जानना, दो बिल्कुल अलग बातें हैं।
पाँच मिनट में नाना पाटेकर ने हमारी फ़िल्म वनवास की कहानी सुनी और कहा—“डन!”
“डन! मैं ये फ़िल्म कर रहा हूँ।”
हमारे चेहरों पर ख़ुशी थी। नाना पाटेकर जैसे महान कलाकार के साथ काम करने का मौक़ा मिलना अपने आप में एक बड़ी बात थी। और फिर मन में एक उत्सुकता भी थी कि जब नाना सर वनवास में दीपक त्यागी का किरदार निभाएँगे, तो वह कैसा होगा? उनके अभिनय में वह किरदार किस ऊँचाई तक पहुँचेगा? कितना कमाल का होगा वह!
जिस कलाकार को मैंने बचपन से पर्दे पर देखा था, अब उसके साथ बैठकर काम करने का अवसर मिलने जा रहा था। यह मेरे लिए सिर्फ़ एक फ़िल्म का हिस्सा बनने की ख़ुशी नहीं थी, बल्कि उस कलाकार को क़रीब से जानने और उसके साथ रचनात्मक यात्रा पर निकलने का अवसर भी था, जिसके अभिनय का मैं वर्षों से प्रशंसक रहा था।
उस मुलाक़ात के बाद नाना पाटेकर मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन गए। उनसे लगभग रोज़ फ़ोन पर घंटों बात होने लगी। कहानी, स्क्रीनप्ले, किरदारों और संवादों पर चर्चा होने लगी। उनके सुझाव इतने सटीक और बुद्धिमत्तापूर्ण होते थे कि मैं कई बार चमत्कृत रह जाता था। वे किसी किरदार के भीतर छिपे ऐसे भाव निकालकर सामने रख देते थे, जिनके बारे में लेखक के तौर पर मैंने भी नहीं सोचा होता था।
धीरे-धीरे मुझे समझ आने लगा कि उनके निभाए किरदार लोगों की ज़िंदगी से इतने गहरे क्यों जुड़ जाते हैं। वे किसी किरदार को सिर्फ़ उसके लिखे हुए शब्दों के सहारे नहीं निभाते थे, बल्कि उसकी आत्मा तक पहुँचने की कोशिश करते थे। वे उसके भीतर छिपे भावों, उसकी मनःस्थिति और उसके अनकहे सच को पकड़ लेते थे। जिस भावना को लेखक शब्दों में व्यक्त करने की कोशिश करता है, नाना सर कई बार उस भावना के भीतर छिपी एक और परत सामने ले आते थे।
उनकी यही बात मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित करती थी। वे सिर्फ़ लिखे हुए संवादों को बोलने वाले अभिनेता नहीं थे, बल्कि किरदार की सोच, उसके दर्द, उसकी कमज़ोरियों और उसकी भावनाओं को गहराई से समझने वाले कलाकार थे। उनके सुझावों से मुझे बार-बार यह एहसास होता था कि एक महान अभिनेता किसी किरदार को सिर्फ़ निभाता नहीं, बल्कि उसे अपने भीतर जीता है।
यही उनकी असाधारण समझ थी, यही उनकी बुद्धिमत्ता और यही उनके अभिनय की ख़ासियत थी।
मैंने उनसे बहुत सीखा, और उनकी कही एक एक बात मुझे हमेशा गुरु बन कर सिखाती रहेगी ।
जैसे-जैसे वनवास की स्क्रिप्ट आगे बढ़ती गई, हमारी मुलाकातें और चर्चाएं भी बढ़ती गईं। कभी उनके खेत पर, कभी गोवा में और कभी जुहू के जे. डब्ल्यू. मैरियट में बैठकर कहानी और किरदारों पर लंबी बातचीत होती थी। हर मुलाकात के साथ हमारा रिश्ता और गहरा होता चला गया।
वनवास के बनने के दौरान शुरू हुआ यह रिश्ता मेरे लिए धीरे-धीरे बेहद पारिवारिक और भावनात्मक बन गया। नाना सर मेरे लिए सिर्फ एक महान अभिनेता या मेरी फिल्म के कलाकार नहीं रह गए थे। वे परिवार के एक सदस्य जैसे बन गए थे।
उनसे मैं अपने मन की कोई भी बात कह सकता था। कोई शिकायत करनी हो, कोई सुझाव देना हो या किसी विचार पर असहमति जतानी हो, मैं बिना किसी संकोच के उनसे बात कर सकता था। यहां तक कि मैं बिना कुछ सोचे, बिना पहले से कोई बात तैयार किए, उनके सामने कोई भी विचार, संवाद या आइडिया रख सकता था।
इसकी वजह थी उनका स्वभाव। वे ईमानदारी में विश्वास करते थे, भावनाओं की सच्चाई को समझते थे और सच को सच की तरह कहने और देखने का साहस रखते थे। उनके साथ बातचीत करते समय मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि हर शब्द को किसी खास तरीके से सजाकर या सोच-समझकर ही कहना है। वे आपकी बात में बनावट नहीं, उसकी सच्चाई तलाशते थे। आप जो महसूस करते हैं, उसे ईमानदारी से कह सकें, यही शायद उनके साथ मेरे रिश्ते की सबसे ख़ूबसूरत बात थी।
उनके साथ मेरा रिश्ता ऐसा हो गया था, जिसमें एक लेखक अपने विचार खुलकर रख सकता था, एक निर्देशक अपने किरदारों पर बेझिझक चर्चा कर सकता था और एक छोटा अपने बड़े से शिकायत भी कर सकता था। हमारे बीच फ़िल्म को लेकर असहमतियां या अलग-अलग विचार हो सकते थे, लेकिन बातचीत में एक अपनापन हमेशा बना रहता था।
और शायद यही किसी भी रिश्ते की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती है, जब आपको सामने वाले के सामने कुछ बनने की ज़रूरत न पड़े। आप जैसे हैं, वैसे ही रह सकें। अपने मन की बात कह सकें और इस भरोसे के साथ कह सकें कि सामने वाला आपकी बात को समझने की कोशिश करेगा।
नाना सर के साथ मुझे यही भरोसा मिला था।
अब सिर्फ़ उनकी आवाज़ यादों में सुनाई देती है…
आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तो यह एहसास और गहरा हो जाता है कि मैंने उनके साथ सिर्फ़ एक फ़िल्म पर काम नहीं किया, बल्कि उनके साथ एक ऐसा रिश्ता जिया, जो मेरे लिए हमेशा अनमोल रहेगा।
नाना सर का इस संसार से चले जाना पूरे फ़िल्म जगत और उन्हें चाहने वाले अनगिनत लोगों के लिए दुःख की घड़ी है। उनके प्रशंसकों के लिए यह एक महान कलाकार को खोने का दुःख है। उनके सहकर्मियों के लिए यह एक असाधारण प्रतिभा के चले जाने का दुःख है। लेकिन मेरे लिए यह दुःख कुछ अलग है।
यह उस इंसान को खोने का दुःख है, जो धीरे-धीरे मेरे अपने परिवार का हिस्सा बन गया था। यह उस आवाज़ को खोने का दुःख है, जो कभी भी फ़ोन पर सुनाई दे जाती थी। यह उन बातचीतों, उन चर्चाओं, उन मुलाक़ातों और उस अपनेपन को याद करने का दुःख है, जो अब सिर्फ़ स्मृतियों में रह गया है।
शायद ज़िंदगी में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिनके जाने के बाद भी वे ख़त्म नहीं होते। वे हमारी यादों में, हमारी बातों में और हमारे भीतर कहीं गहरे जीवित रहते हैं। समय बीतता जाता है, ज़िंदगी आगे बढ़ती रहती है, लेकिन कुछ आवाज़ें हमारे भीतर हमेशा के लिए ठहर जाती हैं।
नाना सर के साथ मेरा रिश्ता भी ऐसा ही रहेगा।
मुझे नहीं पता कि आने वाले दिनों में कितनी बार मेरा मन उन्हें फ़ोन करने का करेगा। कितनी बार किसी संवाद पर काम करते हुए लगेगा कि यह बात नाना सर को सुनानी चाहिए। कितनी बार किसी किरदार के भाव पर चर्चा करते हुए उनका ख़याल आएगा। कितनी बार कोई नया विचार मन में आएगा और मैं सहज ही सोचूँगा कि इस पर नाना सर से बात करता हूं।
और फिर अचानक याद आएगा कि अब दूसरी तरफ़ से वह आवाज नहीं आएगी।
वह आवाज, जो बड़े अपनेपन से मुझे पुकारती थी—
“सिरवैया… कैसा है? हज्जाम… क्या कर रहा है?”
शायद मैं उस आवाज को कभी भुला नहीं पाऊंगा। शायद हर बार उसे याद करते हुए मेरे चेहरे पर एक मुस्कान भी आएगी और आंखें नम भी हो जाएंगी, क्योंकि कुछ लोगों की यादें सिर्फ़ हमें रुलाती नहीं हैं, वे हमें उन ख़ूबसूरत पलों की याद भी दिलाती हैं, जिनकी वजह से हमारी ज़िंदगी थोड़ी और समृद्ध हुई होती है।
नाना सर, आपके साथ बिताया हुआ समय मेरे लिए ऐसी ही एक अनमोल पूँजी है। आपकी सादगी, आपका बेबाक अंदाज़, आपकी बुद्धिमत्ता, आपकी संवेदनशीलता और आपका अपनापन मेरे साथ हमेशा रहेगा।
मैं आपका प्रशंसक बनकर आपसे मिलने आया था। लेकिन उस पहली मुलाकात से लेकर वनवास की पूरी यात्रा तक, आपने मुझे सिर्फ़ एक महान अभिनेता को क़रीब से जानने का अवसर नहीं दिया, बल्कि एक ऐसे इंसान से रिश्ता बनाने का सौभाग्य दिया, जिसकी याद मेरे जीवन का हिस्सा बन चुकी है।
आज आपसे बहुत कुछ कहना है, नाना सर। बहुत-सी बातें हैं, बहुत-से संवाद हैं, बहुत-से विचार हैं, जिन्हें आपके साथ साझा करना है। मगर अब वे बातें मन में ही रह जाएँगी। शायद कभी किसी फिल्म के सेट पर, किसी किरदार के भीतर, किसी संवाद की सच्चाई में या किसी भाव की गहराई में आपकी झलक मिल जाए।
और तब लगेगा कि आप कहीं गए नहीं हैं। आप अपने काम में, अपने किरदारों में और उन लोगों की यादों में मौजूद हैं, जिन्हें आपने अपने जीवन में छुआ।
आपसे मिलने का इंतज़ार अब मुलाक़ात में नहीं, यादों में रहेगा।
और जब भी आपकी आवाज़ मेरे कानों में गूंजेगी, मैं मन ही मन मुस्कुराकर यही सोचूंगा कि अभी फ़ोन आएगा और आप फिर उसी अंदाज में कहेंगे, “कैसा है सिरवैया… क्या कर रहा है हज्जाम…”
नाना सर, आपका यह अपनापन, आपकी यह आवाज और आपके साथ मेरा यह रिश्ता हमेशा मेरे दिल में ज़िंदा रहेगा।
हरि ॐ, नाना सर।

अन्य समाचार