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अनुपमा के साथ सपनों की नई उड़ान

हिमांशु राज

दीपा शाही और राजन शाही के टीवी शो अनुपमा ने हमेशा से सामाजिक दृष्टिकोणों को व्यापक बनाया है, जिसमें न केवल महिलाओं की कहानियां, बल्कि पुरुषों के दिल के भीतर छुपे जज्बात भी सामने आते हैं। यह शो पारंपरिक मान्यताओं को चुनौती देता है और उस दबाव को बखूबी दर्शाता है जिससे पुरुष परिवार की जिम्मेदारियों के बीच अपने सपनों को दबा देते हैं। एक हालिया अभिनय ने इस तथ्य को मजबूती से उजागर किया जब प्रेम कोठारी ने अपने पिता पराग कोठारी के सामने अपने शेफ बनने के सपने को खुलकर रखा। प्रेम ने यह बताया कि उसने परिवार की जरूरतों को समझते हुए जिम्मेदारियां निभाई हैं, लेकिन अपने दिल की आवाज़ सुनते हुए वह शेफ बनने को अपनी असली पहचान मानता है। यह बात उसने अपने भीतर ही चुप रखी थी क्योंकि परिवार में शेफ या रसोइया बनने को छोटा और अनादरणीय माना जाता था।

यह संवाद उस क्लेश को बया करता है जो पुरुष अपने सपनों और समाज-परिवार की अपेक्षाओं के बीच महसूस करते हैं। भारतीय पारिवारिक संरचना में अक्सर पुरुषों के फैसले उनके सपनों से ज़्यादा पारिवारिक दबावों से प्रभावित होते हैं। पराग का किरदार, जो कड़क और नियम समर्थक था, बेटे की ईमानदारी देखकर बदला और उसे सपनों को पूरा करने की खुली मंजूरी दी। यह पल इस सोच को तोड़ता है कि केवल परिवार के हितों के लिए ही फैसले लिए जाने चाहिए।

रूपाली गांगुली ने अनुपमा के किरदार में प्रेमपूर्ण अभिनय के जरिए यह स्पष्ट किया कि कोई भी पेशा छोटा नहीं होता और सपनों को पूरा करने का हक हर किसी को समान मिलता है। साथ ही, इसने पुरुषों के रसोई घर में काम करने जैसी धारणाओं को भी उलट दिया। इस अभिनय में पिता-पुत्र के बीच छुपे अनकहे रिश्ते को बहुत ही संवेदनशील रूप में पेश किया गया है, जो अधिकतर मौन से भरे होते हैं। अनुपमा ने न केवल परिवार और समाज की पारंपरिक सोच को चुनौती दी है, बल्कि यह भी दिखाया है कि कैसे प्यार और समझ से हर बंधन टूट सकता है और इंसान अपने असली सपनों को जी सकता है। यह अभिनय समाज को सुधारने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

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