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लाइफलाइन नहीं `लाशलाइन बनी मुंबई लोकल?

-१५ महीने में ३०९२ यात्री मौत के मुंह में!

-फाइन वसूली में फुर्ती, यात्रियों की सुरक्षा में सुस्ती

फिरोज खान / मुंबई

मुंब्रा लोकल ट्रेन हादसे के बाद, रेलवे एडमिनिस्ट्रेशन ने पैसेंजर सेफ्टी को सबसे जरूरी बताते हुए, ऑटोमैटिक दरवाजों वाली नॉन-एसी लोकल ट्रेनों, १५ कोच कराने और भीड़ मैनेजमेंट का एलान किया था। लेकिन हादसे के १२ महीने बाद भी, इनमें से कोई भी वादा पूरा नहीं हुआ है। सभी वादे खोखले नजर आ रहे हैं और दावे सिर्फ कागजों तक सीमित रह गए हैं। भीड़ कंट्रोल के तरीके अभी भी फाइलों पर हैं, इसलिए रेल पैसेंजर अपनी जान जोखिम में डालकर लोकल ट्रेन से सफर करने को मजबूर हैं। जनवरी से दिसंबर २०२५ तक २,२८७ यात्रियों की मौत हुई और साल २०२६ के पहले तीन महीने में ८०५ यात्रियों के लिए लोकल ट्रेन मौत का सफर बनी। यानी कि १५ महीने में ३,०९२ यात्रियों की मौत हुई।
मौत के इन आंकड़ों से यही लगता है कि रेलवे ने लोकल यात्रियों को कॉकरोच मान लिया है। कॉकरोच जिस तरह से गटर और नाले में गिरकर मरते हैं, वही हालत लोकल ट्रेन यात्रियों की है। रेलवे को यात्रियों की सुरक्षा से ज्यादा फाइन वसूली में दिलचस्पी है। वसूली के लिए स्टेशनों पर टीसी की पूरी टीम लगा दी जाती है, लेकिन स्टेशनों पर एंबुलेंस और हमालों की व्यवस्था बढ़ाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। नतीजा यह हो रहा है कि हादसे में घायल यात्री को फौरन इलाज नहीं मिल पाता है और उसकी मौत हो जाती है।
एक साल पहले हुआ था बड़ा हादसा
९ जून, २०२५ को दिवा और मुंब्रा स्टेशनों के पास हुए लोकल ट्रेन हादसे में पांच यात्रियों की जान चली गई थी और १३ घायल हो गए थे। हादसे के बाद रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के आदेश पर मुंबई सबअर्बन रेलवे के लिए बिना एयर कंडीशन वाली ऑटोमैटिक दरवाजे वाली लोकल ट्रेनों की घोषणा की गई थी। यह भी कहा गया था कि यह लोकल ट्रेन नए साल में पटरी पर आ जाएगी। हालांकि, आधा साल बीत जाने के बाद भी यह लोकल ट्रेन नजर नहीं आई है।
भीड़ वही, सुरक्षा जीरो
मुंबई लोकल रोज ७५ लाख लोग को ढोती है, पर डिजाइन सिर्फ ४५ लाख के लिए है, पीक आवर में ट्रेन २०० प्रतिशत क्षमता से चलती है। दरवाजे पर लटककर जाना मजबूरी बन गई है, रेलवे खुद मानती है कि क्षमता उपयोग १०० प्रतिशत से ज्यादा है, फिर भी नई सर्विस की जगह नहीं।
फाइन वसूली में फुर्ती, यात्रियों की सुरक्षा में सुस्ती
रेलवे के खाते में फाइन गिनने की मशीन फुल स्पीड में चल रही है। अप्रैल-मई २०२६ में सिर्फ २ महीने में वेस्टर्न रेलवे ने ६.८० लाख बिना टिकट यात्रियों से ५०.३३ करोड़ रुपए वसूल लिए। अप्रैल २०२५ से फरवरी २०२६ तक सेंट्रल और पश्चिम रेलवे मिलाकर २६२ करोड़ रुपए का फाइन कटा। पर सवाल ये है कि इतना पैसा वसूलने वाली रेलवे यात्री को बचाने में उतनी ही फुर्ती क्यों नहीं दिखाती? २० साल में ५१,८०२ लाशें गिरने के बाद अब २०२६ में जाकर ऑटो दरवाजे का ट्रायल शुरू हुआ है।

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