-अंतरिक्ष में लगेंगे विशाल शीशे, धरती पर बरसेगी सूरज की रोशनी
संतोषी रावत
अंतरिक्ष में विशाल शीशे स्थापित कर सूरज की रोशनी को सीधे पृथ्वी पर रिफ्लेक्ट करने की तकनीक पर अमरीकी स्टार्टअप ‘रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल’ तेजी से काम कर रहा है। अमरीकी संचार नियामक से हरी झंडी मिलने के बाद कंपनी अपने पहले परीक्षण उपग्रह ‘इअरेंडिल-१’ को पृथ्वी की निचली कक्षा में भेजने की तैयारी में है। इसका मुख्य उद्देश्य रात के समय बिना बिजली के सड़कों, कस्बों और सौर ऊर्जा संयंत्रों को कृत्रिम रोशनी प्रदान करना है।
प्रौद्योगिकी और कार्यप्रणाली
कंपनी की योजना २०३५ तक अंतरिक्ष में लगभग ५०,००० ऐसे परावर्तक उपग्रह तैनात करने की है। जब पृथ्वी पर सूर्यास्त हो जाएगा, तब ये विशाल शीशे अंतरिक्ष से सूर्य की किरणों को मोड़कर धरती के किसी खास ३-मील चौड़े क्षेत्र पर डालेंगे।
संभावित लाभ
२४ घंटे सौर ऊर्जा: रात में सोलर पैनलों पर रोशनी डालकर २४ घंटे लगातार स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है, जिससे जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटेगी।
आपदा प्रबंधन: प्राकृतिक आपदाओं, जैसे भूकंप या बाढ़ के कारण जब बिजली की आपूर्ति ठप हो जाती है, तब यह तकनीक राहत और बचाव कार्यों के लिए तत्काल रोशनी उपलब्ध करा सकती है।
सड़क और औद्योगिक प्रकाश: रात के समय दूरदराज के क्षेत्रों, निर्माण स्थलों और शहरों की सड़कों को बिना अतिरिक्त ग्रिड बिजली के रोशन किया जा सकेगा।
वैज्ञानिक और पर्यावरणीय चिंताएं
यद्यपि यह अवधारणा क्रांतिकारी प्रतीत होती है, लेकिन वैज्ञानिक और पर्यावरणविद इसे लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त कर रहे हैं:
प्रकाश प्रदूषण और स्वास्थ्य: कृत्रिम रोशनी से इंसानों की सार्कार्डियन रिदम (जैविक घड़ी) प्रभावित होगी, जिससे नींद और हार्मोनल संतुलन बिगड़ सकता है।
जीव-जंतुओं पर प्रभाव: उल्लू, चमगादड़ और प्रवासी पक्षियों जैसे रात में सक्रिय रहने वाले जीवों का प्राकृतिक व्यवहार और भोजन तलाशने का चक्र बुरी तरह बाधित होगा।
खगोल विज्ञान में बाधा: इतने चमकीले उपग्रहों से अंतरिक्ष अनुसंधान और टेलिस्कोप से दूरदराज के तारों व आकाशगंगाओं के अध्ययन में भारी अड़चन आएगी।
आंखों के लिए जोखिम: विशेषज्ञों की चेतावनी है कि यदि कोई व्यक्ति या एमेच्योर खगोलविद दूरबीन से इन अत्यंत चमकीले शीशों की तरफ देखेगा, तो उसकी आंखों की रोशनी हमेशा के लिए जा सकती है।
अंतरिक्ष से रोशनी प्राप्त करने का यह प्रयास ऊर्जा के क्षेत्र में नया मोड़ ला सकता है, लेकिन मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण और वैज्ञानिक शोध पर पड़ने वाले इसके दुष्प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
