राजन पारकर / मुंबई
महाराष्ट्र के किसान इस बार दिवाली में खेतों में नहीं, बल्कि सरकार के “पैकेज” के पोस्टर में दीये ढूंढ़ रहे हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 31,628 करोड़ रुपए का ‘इतिहास रचने वाला’ राहत पैकेज घोषित कर दिया-सुनने में तो ऐसा लगा मानो सरकार किसानों के खाते में लक्ष्मी माता को सीधा ऑनलाइन ट्रांसफर करने वाली है। लेकिन असली कहानी कुछ और ही है…
सरकार ने राहत का ऐसा चित्र बनाया है कि जैसे कोई पेंटर बिना दीवार सुखाए ही उस पर रंग चढ़ाने निकल पड़ा हो। कोरडवाहू खेती के लिए 18,500 रुपए प्रति हेक्टेयर, बागायती के लिए 32,500 रुपए, जनावरों, घरों, कुओं, मछलीपालन तक के लिए मुआवजे की घोषणाएं-मानो हर खेत में सरकारी इंद्रधनुष उतर आया हो, लेकिन सच्चाई ये है कि पंचनामे नामक ब्रश अभी तक रंग में डुबोया ही नहीं गया। और बिना ब्रश के सरकार किसान के खातों में दिवाली से पहले पैकेज का दिया जलाने की बात कर रही है।
अर्थ विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने साफ कहा,“दिवाली से पहले किसानों के खाते में पैसे पहुंचना मुश्किल है।” यानी सरकार ने किसानों के लिए दिवाली का दिया तो जला दिया, लेकिन बाती और तेल लाना भूल गई।
सरकार ने तो मानो कोई ‘वेडिंग पैकेज’ की तर्ज पर राहत योजना निकाली है-
“सिर्फ दिवाली से पहले! आकर्षक दरों पर मुआवजा! जनावरों के लिए खास स्कीम!”
लेकिन हकीकत में यह पैकेज ऐसा है, जैसे शादी का कार्ड छप गया हो, मेहमान आ गए हों, पर दूल्हा भाग गया!
31,628 करोड़ का पैकेज, लेकिन पंचनामे अधूरे
दिवाली से पहले राहत का वादा, लेकिन हकीकत में ‘नेटवर्क नहीं, सिस्टम फेल’
किसान उम्मीद में, सरकार फोटोज में
फडणवीस, शिंदे और पवार अब किसानों के गुस्से की ‘आग’ से कैसे निपटें, यही सोच में पड़े हैं। किसानों की दिवाली पर इस बार सरकार ने दिये नहीं, घोषणाओं के पोस्टर बांटे हैं। खेत में धान नहीं उगा, लेकिन वादों का जंगल जरूर उग आया है।
