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फलसफा: अब जेब में पैसे से ज्यादा जरूरी क्यों हो गया है मोबाइल?

सना खान

एक समय था जब घर से निकलते वक्त सबसे पहली चिंता होती थी, जेब में पैसे हैं या नहीं। आज शायद इस सवाल की जगह एक दूसरा सवाल आ गया है कि मोबाइल फोन साथ है या नहीं?
मुंबई में काम करने वाला एक युवक राज सुबह ऑफिस के लिए निकला। रास्ते में उसे पता चला कि मोबाइल घर पर ही छूट गया है। जेब में पैसे थे, लेकिन कुछ ही देर में उसे महसूस हुआ कि समस्या पैसे की नहीं थी। रास्ते के लिए श्aज्े, ऑफिस से संपर्क, भुगतान के लिए यूपीआई और जरूरी जानकारी-सब कुछ मोबाइल से जुड़ चुका था। कुछ घंटों के लिए उसे लगा जैसे उसकी रोजमर्रा की जिंदगी का एक हिस्सा अचानक रुक गया हो। यही आज का बदलाव है कि हम मोबाइल को सिर्फ साथ लेकर नहीं चलते, बल्कि अपनी जिंदगी का एक हिस्सा उसके भीतर लेकर चलते हैं।
इस बदलाव की सबसे बड़ी तस्वीर यूपीआइ के आंकड़ों में दिखाई देती है। एफवाय २०२५-२६ में यूपीआई ने २४,१६१.६९ करोड़ लेन-देन किए और इनकी कुल कीमत ३१४ लाख करोड़ रुपए रही। यानी औसतन करीब ६६ करोड़ यूपीआई लेन-देन हर दिन हुए। जून २०२६ तक ५५.४९ करोड़ लोग यूपीआई से जुड़े थे। पहले पैसा जेब में रखना जरूरी था। अब पैसे तक पहुंचने के लिए मोबाइल रखना जरूरी होता जा रहा है। चाय की दुकान से लेकर बड़े स्टोर तक, ऑटो से लेकर ऑनलाइन खरीदारी तक-भुगतान का तरीका बदल चुका है। कई बार जेब में नकद न होने पर भी परेशानी नहीं होती, लेकिन मोबाइल न हो तो भुगतान का विकल्प ही रुक सकता है।
लेकिन कहानी केवल पैसों की नहीं है
डीजी लॉकर पर ६८.९१ करोड़ से अधिक रजिस्टर्ड यूजर्स और ९६७ करोड़ से अधिक डिजिटल डॉक्युमेंट दर्ज किए जा चुके हैं। यानी दस्तावेज भी धीरे-धीरे हमारी जेब से निकलकर मोबाइल की स्क्रीन पर आ गए हैं। आज मोबाइल में टिकट, यात्रा का रास्ता, बैंकिंग, काम से जुड़े संदेश, जरूरी संपर्क और कई डिजिटल दस्तावेज मौजूद हैं।
कभी जिन कामों के लिए फाइल लेकर कार्यालय जाना पड़ता था, उनमें से कई अब मोबाइल की स्क्रीन पर पूरे हो जाते हैं।
मुंबई में इसका असर रोज दिखाई देता है। सुबह लोकल पकड़नी हो, स्टेशन से ऑफिस तक रास्ता देखना हो, ऑटो या वैâब का भुगतान करना हो, किसी को लोकेशन भेजनी हो या घर से जरूरी फोन आ जाए इसलिए मोबाइल अब मुंबई की तेज रफ्तार जिंदगी की जरूरत बन चुका है।
क्या हमने मोबाइल को सुविधा से आगे बढ़ाकर निर्भरता बना लिया है?
आज मोबाइल की बैटरी खत्म होना सिर्फ फोन का बंद होना नहीं है। डिजिटल भुगतान, जरूरी संपर्क और कई काम अचानक रुक सकते हैं। मोबाइल खोने का मतलब भी अब केवल एक महंगा उपकरण खोना नहीं, बल्कि हमारी डिजिटल दुनिया के एक हिस्से तक पहुंच खोना है।
इसलिए डिजिटल सुविधा के साथ डिजिटल सावधानी भी जरूरी है। फोन में बैंकिंग, ओटीपी, निजी तस्वीरें, दस्तावेज और संपर्क मौजूद हैं। मजबूत पासवर्ड, स्क्रीन लॉक, संदिग्ध लिंक से सावधानी और जरूरी डेटा का सुरक्षित बैकअप अब रोजमर्रा की सुरक्षा का हिस्सा हैं।
कभी जेब में रखा बटुआ हमारी जरूरतों को संभालता था। आज उसी जेब में रखा स्मार्टफोन जेब, डायरी, नक्शा, बैंक, टिकट काउंटर और दस्तावेजों की फाइल-सबका डिजिटल रूप बन गया है।
यानी सफर सिर्फ इतना नहीं है कि मोबाइल ने बटुए की जगह ले ली। असली बदलाव यह है कि हम पैसे जेब में रखने से लेकर पैसे तक पहुंचने के लिए मोबाइल पर निर्भर होने तक आ गए हैं। अगर मोबाइल साथ न हो, तो हमारी जिंदगी का कितना हिस्सा सचमुच रुक जाएगा?
शायद इस सवाल का जवाब ही बता देगा कि मोबाइल हमारे लिए सुविधा है, जरूरत है या अब जिंदगी की अनिवार्यता।

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