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फलसफा: सही होना और समझदार होना

सना खान

एक गांव में दो पड़ोसी रहते थे। दोनों के बीच एक छोटी-सी जमीन को लेकर विवाद हो गया। मामला इतना बढ़ गया कि दोनों ने एक-दूसरे से बात करना बंद कर दिया। वर्षों की दोस्ती कुछ ही दिनों में दुश्मनी में बदल गई। एक दिन गांव के बुज़ुर्ग ने दोनों को बुलाया और पूछा, ‘तुम दोनों क्या चाहते हो?’ पहले व्यक्ति ने कहा, ‘मैं साबित करना चाहता हूं कि मैं सही हूं।’ दूसरे ने भी वही जवाब दिया। बुज़ुर्ग मुस्कुराया और बोले, ‘यदि तुम दोनों सही साबित हो भी गए, तो क्या तुम्हारी दोस्ती वापस आ जाएगी?’ दोनों चुप हो गए।
कुछ पल तक वहां सन्नाटा रहा। दोनों पड़ोसियों को वे दिन याद आने लगे, जब वे एक-दूसरे के सुख-दुख में सबसे पहले खड़े होते थे। एक के घर कोई समस्या आती तो दूसरा बिना बुलाए पहुंच जाता। त्योहार, शादी-ब्याह और कठिन समय-हर मौके पर वे एक परिवार की तरह साथ रहे थे, लेकिन एक छोटे से विवाद ने वर्षों पुराने रिश्ते पर दीवार खड़ी कर दी थी। बुज़ुर्ग ने आगे कहा, ‘जीवन में कई बार सही होने से ज्यादा जरूरी समझदार होना होता है, क्योंकि हर बहस जीतकर भी इंसान कुछ रिश्ते हार जाता है।’ उनकी बात दोनों के दिल को छू गई। विवाद में उन्हें जमीन से ज्यादा, अपने रिश्ते का नुकसान दिखाई दिया था। कुछ दिनों बाद उन्होंने अपना विवाद ख़त्म कर दिया। जमीन का हिस्सा छोटा था, लेकिन रिश्ता उससे कहीं बड़ा था।
बात यही है कि हर लड़ाई जीतना जरूरी नहीं होता। कई बार एक कदम पीछे हट जाना हार नहीं, बल्कि रिश्तों और सुकून को बचाने की समझदारी होती है।
हर बात पर जीत जाना कमाल नहीं होता,
रिश्तों को बचा लेना भी सवाल नहीं होता।
जो झुककर भी दिलों को जोड़ लिया करते हैं,
वही लोग अक्सर सबसे समझदार होते हैं।

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